उत्तराखंडदेहरादून

कार्मिकों की स्थिति चिंताजनक, सेवा-शर्तों के लिए अधिनियम बनाना जरूरी : डॉ. बुटोइया।

सरकार ने बेवकूफ बनाकर निजीकरण से हमारा प्रतिनिधित्व छीना : नानक चंद।

देहरादून : राष्ट्रीय सामाजिक न्याय कृति मंच की राज्य शाखा उत्तराखंड के द्वारा “विश्व श्रमिक दिवस” के उपलक्ष में गूगल मीट के माध्यम से एक ऑनलाइन संगोष्ठी “उत्तराखंड में कार्मिकों की वर्तमान स्थिति एवं भविष्य की चिंता” विषय पर आयोजित की गई।

मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए उत्तराखंड एससी एसटी एम्पलाइज फैडरेशन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष डॉ. जितेंद्र सिंह बुटोइया ने उत्तराखंड के कार्मिकों की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि प्रदेश में कामि॔कों की प्रथम नियुक्ति से लेकर सेवानिवृत्ति तक कोई भी सशक्त अधिनियम अभी तक नहीं बन पाया है। केवल नियमावली से ही काम चलाया जा रहा है, जिसको सरकारें एवं विभागों द्वारा समय-समय पर अपनी सुविधा अनुसार प्रयोग में लाया जाता रहा है। जिस कारण कई बार कई कार्मिकों को निलंबन की स्थिति में ही सेवानिवृत्ति कर दिया जाता है। यह उसकी मानसिक स्थिति के साथ ही परिवार के लिए भी उत्पीड़नात्मक कार्रवाई हो जाती है। निजीकरण के कारण भविष्य में बहुत ही कम सरकारी सेवा में कार्मिक रह जाएंगे, यह भी चिंता का विषय है, जबकि आदर्श स्थिति में सरकार व शासन को अपनी जनता के साथ अपनी इकलौती संतान के जैसा व्यवहार करना चाहिए। प्राय: यह देखा जाता है कि निजी संस्थान चलाने वाले भी अपने पुत्र या पुत्री को सरकारी नौकरी के प्रति तैयार कर रहे हैं। वह भी चाहते हैं कि उनको सरकारी नौकरी ही मिले, तो यह कैसा निजीकरण का पक्ष है। उत्तराखंड के सभी मान्यता प्राप्त संघ एवं गैर मान्यता प्राप्त संघों को भी यह समझने की आवश्यकता है कि कभी ना कभी सभी का नंबर आएगा। इसलिए सभी कार्मिकों के कल्याण के लिए मुद्दों के आधार पर एकजुट होने की आवश्यकता है।

राष्ट्रीय सामाजिक न्याय कृति मंच के अध्यक्ष नानक चंद ने कहा कि कार्मिकों को विभिन्न स्तरों पर उनके प्रतिनिधित्व के प्रतिशत के अनुसार पदोन्नति दी जानी चाहिए। भारत में संविधान लागू होने के पश्चात सरकारों के द्वारा जो प्रयास किए गए उनसे भारत में श्रमिकों की स्थिति में कुछ सुधार आया था, लेकिन अब श्रम कानून में मिले अधिकारों को समाप्त किया जा रहा है, कमजोर किया जा रहा है, श्रमिकों की समस्याओं के निराकरण के लिए कोई बजट का प्रावधान नहीं किया जाता है। विभिन्न श्रमिक संगठनों को विश्वास में ना लिए ही सरकार द्वारा अपनी मनमानी की जा रही है और निजीकरण करते हुए देश की पूंजी कुछ गिने चुने पूंजीपतियों के हाथ में देकर भारत की जनता के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया जा रहा है। कई वर्षों से सफाई कर्मचारी एवं चतुर्थ श्रेणियां के पद समाप्त कर सरकार ने अंतिम व्यक्ति तक सुविधा पहुंचाने के प्रयास को बहुत बड़ा झटका दिया है। यह सामाजिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है।

 

उत्तराखंड एससी एसटी एम्पलाइज फैडरेशन के प्रांतीय कोषाध्यक्ष इंजी. सुनीत सिंह ने कहा कि जातियां पहले आई, जातियों के कारण भेदभाव हुआ, इस भेदभाव के कारण प्रतिनिधित्व अर्थात आरक्षण की व्यवस्था संविधान में की गई। जब जातियां समाप्त नहीं हो रही हैं जिनके कारण भेदभाव है तो प्रतिनिधित्व व आरक्षण एवं पदोन्नति में आरक्षण को क्यों समाप्त किया जा रहा है ? उन्होंने कहा कि वर्ष 2012 से पदोन्नति में आरक्षण विषयक संवैधानिक बिल लोकसभा से पास होने के बाद राज्यसभा में आज तक भी लंबित है।

सरकारें किस तरह से वंचित वर्ग को प्रतिनिधित्व देने या आरक्षण के पक्ष की बात कर सकती हैं। यह चिंता का विषय है केवल भाषण देने से अखबारों में छपवाने से ही देश का कल्याण संभव नहीं है। कार्मिक की स्थिति को सुधारने के लिए उनको सभी स्तरों पर प्रतिनिधित्व दिए जाने की आवश्यकता है। उत्तराखंड में भी इरशाद हुसैन आयोग की रिपोर्ट को अभी तक दबा कर रखा जा रहा है।

एससी एसटी शिक्षक एसोसिएशन उत्तराखंड के प्रांतीय उपाध्यक्ष रघुवीर सिंह तोमर ने कहा कि विभागों में रोस्टर प्रणाली एवं विभिन्न उत्पीड़नात्मक कार्रवाई के लिए अनुश्रवण समिति बनाई जाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि विभिन्न कार्यालय में वंचित वर्ग के प्रति एक विशेष प्रकार का दृष्टिकोण प्राय: देखने में आता है, जो की चिंता का विषय है, जिसकी भविष्य में और अधिक बढ़ाने की संभावना है।

विशंभर सिंह ने कहा कि उत्तराखंड में पदोन्नति में आरक्षण समाप्त कर सरकार ने एससी-एसटी के संवैधानिक अधिकार को समाप्त करते हुए भारत के संविधान में दी गई व्यवस्थाओं को समाप्त करना शुरू कर दिया है, उन्होंने कहा कि जब तक संविधान सुरक्षित है, तभी तक अधिकारी, कर्मचारी, शिक्षक एवं उनके परिवार संस्थान व आमजन सुरक्षित हैं।

आशा टम्टा ने कहा कि उत्तराखंड के समस्त कार्मिकों के साथ मानव कल्याण की भावना को प्रशस्त करने के लिए हमें भारत के संविधान, सम्मान, सुरक्षा और संवर्धन की आवश्यकता है।

इस अवसर पर सुरेश चंद्र बिरला पार्वती आर्य शशि मुयाल आशा टम्टा के आर आर्य जे पी सिंह सुरेश आग्री भरत सिंह हरीश शाह महिपाल कोहली के एम आर्य संजय कुमार बीरबल सिंह रविंद्र सिंह दिनेश राकेश कुमार रमेश आदि ने अपने विचार रखें।

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