उत्तराखंडदेहरादून

इन्दिरा मार्केट रि – डैवलपमैंट प्लान का मुख्यमंत्री द्वारा उद्घाटन के बावजूद अपने वायदों पर खरे नहीं उतरे : अनन्त आकाश।

देहरादून : इन्दिरा मार्केट रि- डैवलपमैंट प्लान का उद्घाटन माननीय मुख्यमंत्री जी के करकमलों से किया गया , यह इस प्लान का दूसरा उद्धघाटन था ।उद्घाटन के समय समय बड़े- बड़े दावे किये गये थे तथा प्रभावितों से वायदा किया गया था कि चौदह माह के अन्तर्गत पहली शिफ्टिंग नये काम्प्लेक्स में हो जायेगी किन्तु घोषणाएं व वायदे पूर्व की भांति धरे के धरे रह गये ,सभी स्तरों की लापरवाही एवं लचर व्यवस्था ने प्रभावितों को अपने हाल पर छोड़ दिया है उनकी उम्मीद एवं विश्वास धाराशायी हो गया ,इसे पुनः स्थापित करने के लिऐ लम्बा समय लगेगा ।_

इन्दिरा मार्केट रि – डैवलपमैंट परियोजना स्वीकृत हुऐ लगभग 10 साल हो गये हैं । लम्बे समय के बाद भी पहले चरण का कार्य में भी खुदाई तक न होना बेहद गैरजिम्मेदाराना बात है *जबकि वर्तमान सरकार द्वारा परियोजना की कीमत 150 सौ करोड़ से 250 करोड़ की गई ।परियोजना का कार्य लगभग ठप्प पड़ा रहा इस बात को दर्शाता है कि किसी को न किसी की चिन्ता न कोई प्रवाह है ।इससे प्रश्नचिन्ह स्वत: अन्य परियोजनाओं में लग जाता है ।आज 10 साल बाद सामक कम्पनी को मिला ठेका निरस्त होना अन्तत: यही साबित होता है ।

देहरादून में चल रही स्मार्ट सिटी से लेकर अन्य परियोजनाओं का कार्य न केवल असन्तोषजनक है बल्कि इसके निर्माण के लिऐ भारी कीमत चुकानी पड़ रही है ।*

दो साल पहले जब इस परियोजना में कार्य शुरुआत की बात चल रही थी तो सैकड़ों परिवारों की उम्मीदें जागी थी यह महसूस किया जा रहा था कि अब कुछ होगा ।

*यह क्षेत्र जहाँ रि-डैवलपमैंट का कार्य प्रस्तावित है , जिस स्वरुप में आज है ,पहले नहीं था ,तथा आगे ऐसा नहीं रहेगा । किसी जमाने में इसके पास अंग्रेजी फौज की परेड हुआ करती थी ,जिसे हम परेड ग्राउण्ड के नाम से जानते हैं ।* *लोकल बस स्टैंड पहले देहरादून शहर का हृदय स्थल हुआ करता था ,यहीं से सरकारी सिटी बसें चला करती थी ,प्रतिदिन हजारों लोग यहाँ से आते जाते रहे थे । यहाँ का बुकिंग कार्यालयक्ष,वह किसी जमाने में अंग्रेजों विश्रामालय एवं कैन्टीन हुआ करती थी ।अंग्रेज मसूरी से आते जाते यहाँ रूकते थे । जहाँ आज अस्थाई मार्केट है वहाँ कुछ बर्ष पूर्व नगरपालिका देहरादून का गेस्ट हाऊस एवं स्टाफ क्वार्टर थे ।लोकल बस स्टैण्ड धारा पुलिस चौकी के सड़क के इस पार जहाँ आज हेमवतीनंदन बहुगुणा एम डी डी ए काम्प्लेक्स है वहाँ पर पी डब्ल्यू डी गेस्ट हाऊस था तथा उसके पीछे की तरफ राशन विभाग के स्टाफ क्वाटर तथा राशन का डिपो था ।इन्दिरा मार्केट जहाँ है 1986 तक हरेभरे पेड़ों से आच्छादित था ।सबसे पहले तिब्बती बसे व बाद को फड़ें लगी व एम डी डी ए ने दुकानें बनाई ।बगल में पवेलियन ग्राउण्ड आज भी मौजूद है , जहाँ किसी जमाने में फुटबॉल का मैच*खूब होता था_ ।

परिवर्तन एक सतत् प्रक्रिया जिसे होना ही होता है । यह कभी अच्छाई के लिये भी हो सकती है ,तो कभी इसके दुष्परिणाम भी आते हैं ।

बिस्थापन की पीड़ा आदमी को हिलाकर रख देती है किन्तु परिस्थितियां उसे बिस्थापित होने के लिए मजबूर करती हैं । हममें से भी कोई न कोई बिस्थापित होकर ही आया है । बिस्थापन के दौरान एक पीड़ा यह भी रहती है कि एक रोजगार जो हमने पीढियां ब्यतीत कर जमाया है, वह अचानक भराभरा कर बिखर जाता है ।मनुष्य को कभी न कभी इन परिस्थितियों से गुजरना ही पड़ता है । सामान्यत: हमारी सरकारों के पास ऐसी नीतियों का अभाव रहा है कि जिसके बिस्थापन की पीड़ा न सहना पड़़ा । *जैसा आज रि डैवलपमैंट परियोजना से प्रभावित लोगों के साथ हो रहा है 10 साल व्यतीत होने के बावजूद स्थिति जस कि तस हो गई है । पूंजीवादी व्यवस्था में ज्यादा मुनाफे एवं अनियोजित विकास का धंस प्रभावितों को झेलना पड़ रहा है ,जिसका असर पीढियों तक चलता रहेगा ।

इसमें रि – डैवलपमैंट में पहले लोकल बस स्टैंड मार्केट हटा ,चरणबद्ध ढ़ंग से इन्दिरा मार्केट के हिस्से भी हटाये जाने प्रस्तावित थे तथा एक भीमकाय मल्टी मार्केट ने आकार लेना था किन्तु संस्था का गैरजिम्मेदाराना रवैया ,एमडीडीए द्वारा समुचित ढंग से देखभाल न किया जाना तथा सरकार का वायदों पर खरा प्रभावितों को सोचने के लिऐ मजबूर कर दिया है क्या उनके साथ धोखा तो नहीं हुआ।

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