
देहरादून : साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज : अनन्त आकाश।
1919 को बैसाखी दिन जलियांवाला बाग में एकत्रित निहत्थे लोगों पर जनरल डायर के नेतृत्व हुई गोलीबारी में सैकड़ों की जाने गई ,इस जधन्य काण्ड ने अंग्रेजी हुकुमत का असली चेहरा सामने आ गया था ,जिसके परिणामस्वरूप देश को अंग्रेजी हुकुमत खिलाफ तेजी संगठित होने का मार्ग दिखाया ।जलियांवाला बाग के शहीदों को शत् शत् नमन !_
1919 के जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड के बाद ब्रिटिश सरकार ने साम्प्रदायिकता को खूब हवा दी ।इसके चलते 1924 में कोहाट में बहुत भयानक हिन्दु-मुस्लिम दंगे हुए ।इसके बाद, राष्ट्रीय आन्दोलन में साम्प्रदायिक दंगों पर लम्बी बहस चली। इन्हें खत्म करने की जरुरत महसूस कर रहे थे । काग्रेंसी नेताओं ने हिन्दु और मुस्लिम नेताओं के बीच सुलहनामा लिखाकर दंगों को रूकवाने का प्रयत्न किया । _इस समस्या के समाधान के लिये क्रान्तिकाऱी आन्दोलन ने भी योगदान दिया । यह लेख1928 के जून मे कीर्ति में छपा तथा भगत सिंह व उनके साथियों के विचारों को आगे प्रस्तुत किया जा रहा है ।_
_आज जब बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता ,भारतीय राष्ट्र-राज्य को ही परिभाषित करने पर आमादा है, जिसका साक्ष्य सी ए ए-एनपीआर -एन आर सी मोदी का त्रिशूल है ,_ जिसका देश की तमाम धर्मनिरपेक्ष ,जन तान्त्रिक व देशभक्त ताकतों द्वारा कडा़ प्रतिरोध किया गया । _साम्प्रदायिकता ,राष्ट्र के सन्दर्भ मे भगत सिंह और उनके साथियों के विचार और भी प्रासंगिक हो गए हैं ।
_ भारतबर्ष की स्थिति सर्वाधिक दयनीय है ।एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों के जानी दुश्मन हो गये हैं ।अब तो ऐ हो गया है दूसरे धर्म का होना ही कट्टर शत्रु होना है ।अब ही हाल के लाहौर के ताजे दंगे ही देख ले किस पप्रकार मुस्लिम ने हिन्दू ,सिखो पर जुल्म ढाहे और मौका मिलते ही सिख भी पीछे नहीं रहे । इसलिए कि अपने मजहब का नहीं है ।
ऐसे में हिन्दुस्तान का भविष्य. अन्धकारमय नजर आता है ।इन धर्मों ने हिन्दुस्तान का बेडा गर्क कर दिया है ।अभी पता नहीं ऐ घातक दंगे भारत का पीछा कब छोडेंगे ।इस बहाव मे कुछ बिरला लोगों ही इस साम्प्रदायिक बहाव नहीं बहते हैं । अधिकाशं लोग इस बहाव मे बहकर अपने सम्प्रदाय के इर्दगिर्द गोलबन्द हो जाते हैं ।
साझी राष्ट्रीयता की बुनियाद ःजहॉ तक देखा गया है कि इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेता तथा अखबारो का हाथ है । इस जो नेता बडी बडी बातें करते थे या तो चुप हैं या फिर साम्प्रदायिकता के बहाव मे बह रखें हैं । जो सबका भला चाहते हैं उनकी संख्या कम है । पत्रकारिता का व्यवसाय जो बहुत ऊचा माना जाता था आज दूसरे के बिरूद्ध बडे बडे शीर्षक छापकर दंगे भडकाने मे लगे हुए हैं ।ऐसे लेखक बहुत कम है जो माहौल को शान्त करने के पक्ष मे लगे हैं । अखबारों का सही उद्देश्य लोगों को शिक्षा ,जानकारी तथा राष्ट्रीय हित के लिए काम करना है ।न कि साम्प्रदायिक राजनीति कर भारत की व्यापक एकता को कमजोर करना । असहयोग आन्दोलन की एकता भी सभी को याद है जब नेताओं व पत्रकारों ने भारी कुर्बानी दी थी ।
दंगों का मूल कारण आर्थिक होता है ।यह आर्थिक दशा सुधार के ही द्वारा ही रोका जा सकता है । क्योंकि भारत की दशा अत्यधिक दयनीय है ।वर्तमान मे विदेशी सरकार होने कारण इस दिशा मे प्रयास व्यर्थ हैं ।इसलिए सरकार को बदलने का प्रयास तेज किऐ जाने चाहिए ।मेहनतकशों के असली दुश्मन पूजीपति हैं ।संसार के सभी गरीबोंं को सबकुछ भूलाकर सरकार की ताकत अपने हाथ मे लेनी चाहिए ।हमारी पहचान धार्मिकता नहीं बल्कि वास्तविक पहचान भारतीयता है ।



