
25 साल क्या है हाल वो कह रहे बेमिसाल बेमिसाल।
उत्तराखंड का निर्वाचन आयोग पिछले तीन दिनों से हाईकोर्ट के दरवाजे पर खड़ा है सेकंड सैटरडे को छुट्टी के दिन दरवाजा खटखटाया कि चुनाव चल रहे हैँ हमारी सुन लो लेकिन दरवाजा नहीं खुला. फिर इतवार को चुनाव की एक प्रक्रिया को स्थगित की आशंका की बात के बीच दरवाजा खटखटाया लेकिन कोर्ट ने कह दिया सोमवार को आना।
जिस निर्वाचन आयोग ने आज चुनाव लड़ने वालों को चुनाव जारी करने थे वह कल देर शाम को चिट्टी जारी कर रहा है कि सोमवार 2:00 बजे तक रुक जाओ. किसी निर्वाचन आयोग का इस प्रकार लगातार हाई कोर्ट के दरवाजे पर जाना कोई सामान्य घटना नहीं है.आयोग की इस बुरी स्थिति की शुरुआत चमोली जनपद के जिलाधिकारी डॉक्टर संदीप तिवारी की एक आधिकारिक चिट्ठी से हुई संदीप तिवारी वहीं जिलाधिकारी है जो पिछले दिनों अपनी शादी को लेकर तब चर्चा में आए जब उन्होंने 2 घंटे में शादी निपटाकर बाकी दिन जिलाधिकारी के रूप में अपना काम निपटाया,उन्होंने चुनाव आयोग से पूछा कि जिन लोगों के नाम निकाय मतदाता सूची में भी हैं और ग्रामीण क्षेत्र में भी हैं वह चुनाव लड़ सकते हैं या नहीं।
संदीप तिवारी की चिट्ठी के जवाब मे उत्तराखंड चुनाव आयोग ने 6 जुलाई को चिट्ठी जारी की और साफ साफ लिखा जिन लोगों के एक से अधिक स्थान पर अर्थात नगर निगम,नगर पालिका नगर पंचायत कैंट बोर्ड और गांव की मतदाता सूची में भी नाम है उन्हें चुनाव लड़ने से नहीं रोकना है. यहीं से सवाल उठने शुरू हुए कि एक देश मे दो कानून कैसे और भारत निर्वाचन आयोग उत्तराखंड निर्वाचन आयोग को गलत आदेश से रोक क्यों नहीं रहा है।
इस मसले पर शक्ति बर्त्वाल ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और पूछा कि एक प्रदेश में दो प्रकार के नियम कैसे चल रहे हैं कुछ लोगों को दो स्थानों पर वोट होने के कारण उनका नामांकन रद्द कर दिया है जबकि हजारों लोगों को बचा लिया गया है.यहीं से निर्वाचन आयोग का रायता फैलना शुरू हुआ जो अभी तक संभल नहीं पा रहा है. यह सब कुछ स्वाभाविक रूप से नहीं हो रहा है बल्कि वर्षों तक IAS पद पर रहने के बाद रिटायर होकर चुनाव आयुक्त बने सुशील कुमार की देख रेख मे हो रहा है. सुशील कुमार को चुनाव आयुक्त की यह जिम्मेदारी किसी लिखित मौखिक परीक्षा देकर नहीं की गई बल्कि उसी प्रकार के ख़ास इंटरव्यू से हुई जैसे विगत 25 सालों से उत्तराखंड में रिटायर होने वाले IAS विभिन्न पदों पर बैठ रहे हैँ।
सोशल मीडिया से लेकर हाईकोर्ट में इतनी बुरी स्थिति तब हो रही है जब चुनाव आयुक्त बने सुशील कुमार के पास नियम कायदे कानून की बहुत मोटी-मोटी किताबें हैं और 60 साल तक नौकरी करने का अनुभव भी है.अपने सेवा काल में वे नगर आयुक्त देहरादून, जिला मजिस्ट्रेट, पिथौरागढ़ और जिला मजिस्ट्रेट पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड के श्रम आयुक्त और गन्ना आयुक्त, राजस्व विभाग के सचिव और खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति और उपभोक्ता मामले विभाग के सचिव के रूप में भी कार्य कर चुके हैँ।
25 साल के उत्तराखंड में जब आयोग की यह दुर्गति है तो निश्चित रूप से उत्तराखंड के लिए इससे दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति कोई नहीं हो सकती कि स्वतंत्र कहे जाने वाला आयोग और इतनी मजबूत सरकार आज चुनाव लड़ने वाले चंद धन पशुओं ‘कबूतरबाज बरसाती मेंढकों” के सामने मेमने साबित हो रहे हैं.ये धनपशु ही आरक्षण से लेकर डबल मतदाता व्यवस्था के सबसे बड़े कारक हैँ. अपने कार्यकर्ताओं और पव्वा प्रमुख को चुप बिठाकर इन धनपशुओं को सिर पर बिठाना इतिहास मे लिखा जायेगा.
अभी भी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है उत्तराखंड हित मे कइयों को रीड को सीधी करने की जरूरत है।
इस पूरे प्रकरण में मजेदार बात यह है कि मित्र विपक्ष पूरी तरह मित्रता निभा रहा है और उन्हें IAS अधिकारी संदीप तिवारी की चिट्ठी ढूंढने से भी नहीं मिल रही वो भी बर्त्वाल की मारण शक्ति से जिन्दा दिखने की कोशिश कर रहा है. शक्ति बर्त्वाल ने पिछले 4 दिनों से कइयों को नींद की गोली खाने को मजबूर कर रखा. डाक्टर संदीप तिवारी का लिखा परचा सबको याद रहेगा कुछ ही शब्दों मे सारी जांचे लिखवा डाली।

