
( _Dehradun city of love and struggle )_
*अपने देहरादून को जानिऐ !
ऐतिहासिक झण्डे मेले पर बिशेष : अनन्त आकाश* देहरादून कैसे बना !
करोड़ों लोगों और जीव-जन्तुओं के जीवन को सीधे प्रभावित करने वाली गंगा-यमुना नदियों के मध्य स्थित है दून घाटी ।
संस्कृत भाषा में घाटी को द्रोणी या द्रोण कहा जाता है। यह उपत्यका उत्तर में हिमालय और दक्षिण में शिवालिक पर्वत श्रृखलाओं के बीच स्थित है। दून उपत्यका के पूर्व में गंगा और पश्चिम में यमुना बहती है। दून घाटी के साथ संपूर्ण उत्तराखण्ड क्षेत्र का पौराणिक काल से अपना महत्व रहा है। पौराणिक साहित्य केदारखण्ड में गढ़वाल क्षेत्र का व मानस खंड में कुमायूँ का वर्णन मिलता है। _दक्ष प्रजापति, शिव-पार्वती, राम-लक्ष्मण-भरत व उनके पूर्वज भगीरथ के साथ पांडव- कौरव और उनके गुरू द्रोणाचार्य आदि-आदि पौराणिक काल की कथाओं, कहानियों का सम्बन्ध इस क्षेत्र से किसी न किसी रूप में हमें देखने को मिल जाता है। पौराणिक कथायें यहाँ की लोक संस्कृति में आज भी खूब रची-बसी हैं। आज हम सभी इस बात से परिचित हैं कि आज से लगभग साठ पैंसठ मिलियन वर्ष पहले यूरेशियाई और इंडियन प्लेट की टकराहट के कारण हिमालय पर्वत की उत्पति संभव हुई। इसी हिमालय के एक हिस्से में अपना उत्तराखण्ड प्रदेश स्थित है और देहरादून इसकी तलहटी में शिवालिक श्रृंखला के मध्य की उपत्यका में बसा है। भूगर्भीय घटनाओं के फलस्वरूप दून घाटी में कुदरत ने अपना खजाना जमकर लुटाया है।_ घाटी के बीच में कई छोटी-छोटी घाटियाँ भी हैं, जिसके कारण यहाँ पूरब-पश्चिम दोनों तरफ कई नदी-नाले देखने को मिल जाते हैं। कुछ नदियाँ तो सदानीरा हैं और कुछ बरसाती। साल के जंगल यहाँ की खूबसूरती में चार चांद लगा देते हैं। यही कारण है कि यहाँ की भूमि खेती- किसानी के मामले में काफी समृद्ध रही है। अनियोजित, अवहनीय विकास कार्यों और सरकारों की जनविरोधी, पर्यावरण विरोधी नीतियों के चलते यह खूबसूरत घाटी अपने प्राकृतिक वैभव को तेजी से खोती जा रही है।
*कालसी में स्थित अशोक कालीन शिलालेख इस बात की ताकीद अवश्य करते हैं कि दून घाटी का यह क्षेत्र मौर्य शासनकाल ई0पू0 321-184 में अवश्य ही फलता-फूलता रहा होगा, तभी सम्राट अशोक ने यहाँ अपना शिला-लेख स्थापित करना उचित समझा होगा। कालसी में अशोक कालीन, 273-232 ईसा पूर्व का यह शिला-लेख आज भी मौजूद है।* सन् 1860 में एक अंग्रेज अफसर मिस्टर फोरेस्ट ने इसकी खोज की थी। दून उपत्यका में शिव भवानी और शील वर्मन के अभिलेख भी मिले। शील वर्मन के अभिलेख अंबाड़ी से पूर्व बाड़वाला के जगत ग्राम के यज्ञ कुण्ड से मिले जिसके बारे में कहा जाता है कि वहाँ यज्ञाग्नि प्रज्वलित की गई थी। _दून के इतिहास में रानी कर्णावती का विशेष योगदान देखने को मिलता है। गढ़वाल के अधिकतर इतिहासकारों का मानना है कि कर्णावती गढवाल के राजा महिपति शाह की रानी थी। महिपति शाह की मृत्यु के समय उनके पुत्र पृथ्वीशाह की आयु कम थी, इस कारण रानी कर्णावती को शासन की बागडोर अपने हाथ में लेनी पड़ी। राजपुर की नहर जो रिस्पना नदी से निकलती है, उसका निर्माण रानी कर्णावती ने सन् 1635 ई0 में कराया था। रानी कर्णावती की राजधानी नवादा रही जहाँ उन्होंने किले का निर्माण भी कराया।_ *दून के अजबपुर, करणपुर, कौलागीर, क्यारकूली व भोगपुर आदि गाँवों की स्थापना भी उसी समय की गई थी। सत्रहवीं शताब्दी तक यह क्षेत्र उजड़़ता-बसता रहा।*
_आधुनिक नगर की स्थापना-*_
*सन् 1676 ईसवी में सिक्खों के सातवें गुरू हर राय के पुत्र गुरू राम राय अपने अनुयायियों के साथ औरंगजेब के परिचय पत्र को लेकर यहाँ आये। वे पहले टोंस नदी के किनारे कांदली में कुछ समय तक रहे और बाद में खुड़़बुड़़ा आकर रहने लगे। यह क्षेत्र उस समय गढ़वाल के राजा फतेह शाह के आधीन था। गढ़वाल नरेश फतेह शाह ने उन्हें खुड़़बुड़़ा, राजपुर और चामासारी गांव दान में दिये, बाद में फतेह शाह के पौत्र प्रदीप शाह ने धामावाला, धरतावाला, पण्डितवाड़़ी सहित कुछ और गांव प्रदान किये। गुरू राम राय जी ने धामावाला में एक कच्चा मन्दिर बनवाया था जिसे बाद में माता पंजाब कौर ने पक्का कराया। इस स्थान को डेरा कहा जाने लगा। इसी मन्दिर “दरबार˝ के चारों ओर खुड़़बुड़़ा और धामावाला गांवों में नगर का विस्तार हुआ। पंजाबी में गुरू के स्थान को डेरा कहा जाता है और दो पहाड़़ों के बीच की घाटी को द्रोण कहते हैं। गुरू राम राय का यहाँ डेरा होने से ही इस स्थान को पहले डेरादून कहा गया जो कालान्तर मे ‘‘देहरादून‘‘ नाम से जाना जाने लगा। औरंगजेब की मृत्यु के बाद दिल्ली का शासन कमजोर पड़ गया था। सहारनपुर में रुहेलों का सरदार नजीबुद्दोला बैठा था, जिसे नजीब खाँ के नाम से भी जाना जाता है। वैभवशाली देहरादून ने नजीबुद्दोला को अपनी ओर आकर्षित किया। सन् 1757 में रुहेला सरदार नजीब खॉं ने दून पर पहला आक्रमण किया। बहुत हल्के प्रतिरोध का सामना करते हुए जल्द ही दून पर उसका आधिपत्य स्थापित हो गया। उसने यहाँ कुओं, नहरों आदि का निर्माण भी कराया। यहाँ के निवासियों को और अधिक जमीन देकर खेती, व्यापार आदि के लिये प्रोत्साहित किया तथा बिना अत्यधिक कर लगाये उसने सवा लाख रुपये का राजस्व प्राप्त किया। उसके शासन काल, सन् 1757 से सन् 1770, में देहरादून और समृद्ध हुआ। सन् 1770 में नजीब खाँ की मृत्यु के साथ ही दून का वैभव भी कम होने लगा। यह क्षेत्र पुनः गढवाल राज्य के अधीन आ गया। सन् 1804 ईसवी के जनवरी महीने में गढवाल के राजा प्रद्युम्न शाह गोरखाओं से लड़ते हुए खुड़बुड़ा में वीर गति को प्राप्त हुए। इस प्रकार सन् 1804 में देहरादून सहित सम्पूर्ण गढ़वाल पर गोरखाओं का शासन स्थापित हो गया जो 1814 तक रहा। 1814 के अक्तूबर-नवंबर महीने में एंग्लो गोरखा युद्ध के दौरान दून में अंग्रेजी सेना को जान माल का काफी नुकसान सहना पड़़ा। नवंबर के अन्त में दून के खलंगा किले पर, अंग्रंजों ने कब्जा कर लिया था। अब दून अंग्रेजों के अधीन आ गया। 17 नवंबर 1815 को देहरादून को सहारनपुर जिले में शामिल करने का आदेश जारी हुआ। उत्तरी सहारनपुर के तत्कालीन सहायक कलेक्टर मिस्टर काल्वर्ट को देहरादून जाने का हुक्म हुआ। सन् 1822 में एफ0 जे0 शोर ने काल्वर्ट का स्थान लिया। एफ0 जे0 शोर को यहाँ का ज्वाइंट मजिस्टट्रेट व सुपरिटेंडेंट ऑफ दून बनाया गया। शोर के कार्यकाल में यहाँ काफी विकास के कार्य हुये। सन् 1822-23 में ही सहारनपुर से दून को जोड़ने वाली पक्की सड़क का निर्माण हुआ जो लक्खीबाग से धामावाला होते हुये राजपुर जाती थी। सन् 1854 में ए0पी0 मिशन स्कूल की स्थापना हुई । सन् 1864 में ओल्ड सिरमौर राइफल को यहाँ रुकने का आदेश हुआ। इसके बाद पल्टन के लिये पल्टन बाजार बना, पास ही परेड ग्राउण्ड भी अस्तित्व में आया और इस तरह देहरादून के आधुनिक नगर बनने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। ब्रिटिश शासन काल में यहाँ नहरों के निर्माण, लीची के बाग लगने, चाय बागान की स्थापना, बासमती धान की खेती आदि काम प्रारंभ हुये। देहरादून की बासमती विश्व प्रसिद्ध रही। बासमती धान के बीज को यहाँ लाने का श्रेय अफगानिस्तान के शासक दोस्त गुलाम मौहम्मद को जाता है, जो यहाँ निर्वासित जीवन बिता रहे थे। ब्रितानिया हुकूमत के दौरान ही यहाँ फारेस्ट रिसर्च इन्स्टीट्यूट (एफ आर आई) ,सर्वे आफ इण्डिया, इण्डियन मलेटरि एकेडमी (आई एम ए, )राष्ट्रीय मलेटरी कालेज (आरआईएम
सी) आदि जैसे केन्द्रीय संस्थानों की स्थापना हुई। उस दौर की ऐतिहासिक ईनाममुल्ला बिल्डिंग, एल0 आई0 सी0 बिल्डिंग,मंशाराम बिल्डिंग भी आज भी शहर के मध्य में है। सन् 1901 में दून रेल सेवाओं से जुड़ा।*
*आजादी का आंदोलन और देहरादून-
* स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गांधी, नेहरू, तिलक आदि जैसे राष्ट्रीय नेताओं का यहाँ आना जाना रहा। आजादी के आंदोलन में यहाँ के निवासियों ने अग्रणीय भूमिका निभाई। कई जगह पिकेटिंग व सत्याग्रह आंदोलन हुये। गाँधी जी के कहने पर खड़ग बहादुर के नेतृत्व में यहाँ खाराखेत नामक स्थान पर लून नदी पर नमक बनाकर नमक कानून को तोड़ा गया जिसमें चौधरी बिहारी लाल, हुलास वर्मा, महावीर त्यागी, नरदेव शास्त्री सरीखे नेताओं को सजा हुई। एक ओर यहाँ कांग्रेस के नेतृत्व में, बाबू बुलाकी राम, शर्मदा त्यागी, ठाकुर चंदन सिंह, श्री राम शर्मा आजादी के आंदोलन को आगे बढ़ा रहे थे वहीं यह देहरादून शहर राष्ट्रीय फलक के चमकदार क्रान्तिकारी सितारों एम0 एन0 राय, रास बिहारी बोस, राजा महेन्द्र प्रताप, शिव वर्मा अनेकानेक लोगों की कर्मस्थली व शरणस्थली बनी। प्रख्यात साहित्यकार एवं अपने घुमक्कड़ स्वभाव के लिये जाने जाते रहे राहुल साँकृत्यायन के मसूरी प्रवास से मजदूर आंदोलन को बल मिला। सन् 1912 ईसवी में पूर्ण सिंह नेगी जी ने शिक्षा के प्रसार के लिये डी0 ए0 वी0 कालेज की स्थापना हेतु अपनी जमीन दान में दे दी थी। कलन्तर में लाल जुगुमुन्दर जी ने स्वास्थ्य एवं खेल तथा नगरपालिका हेतु अपनी जमीन दान दिया । पत्रकारिता के माध्यम से टिहरी राजशाही के खिलाफ़ व आजादी के आंदोलन में गढ़वाली के संपादक विशम्भरदत्त चंदोला, युगवाणी के संपादक गोपेश्वर प्रसाद कोठियाल, नया जमाना के कामरेड राधाकृष्ण कुकरेती अपनी विशिष्ट भूमिका का निर्वहन कर रहे थे। आखिर 15 अगस्त सन् 1947 को अंग्रेजी हुकूमत से देश को आजादी मिल गई, पर देश में अन्य देशी रियासतों की तरह टिहरी रियासत तो अभी राजा के अधीन ही थी। टिहरी रियासत में राजा के कुशासन के विरुद्ध जन विद्रोह अब चरम पर था। तिलाडी़ किसान आन्दोलन की शहादतें तथा श्रीदेव सुमन की शहादत रंग ला रही थी। 11 जनवरी 1948 के दिन कीर्तिनगर में राजा की मिलिशिया पुलिस के एडीओ ने कामरेड नागेन्द्र और मोलू भरदारी की गोली मार कर हत्या कर दी जिन्होंने कीर्तिनगर को अपने कब्जे में लेकर राष्ट्रीय ध्वज फहरा दिया था। कामरेड नागेद्र सकलानी और कामरेड मोलू भरदारी, श्रीदेव सुमन, तिलाडी़ विद्रोह के शहीदों की शहादत को कौन भूल सकता है। कामरेड गुणानंद पथिक द्वारा राजशाही के खिलाफ जन जागरण, कामरेड चंद्रसिंह गढ़वाली के नेतृत्व में 12 जनवरी 1948 को शहीदों की शव यात्रा टिहरी के लिये निकली। शहीदों के शव कम्युनिस्ट पार्टी के झण्डे से लिपटे हुये थे। स्थानीय जनता अपने इन नौजवान शहीदों के दर्शन कर रही थी और इन पर फूल वर्षा कर रही थी। इस यात्रा के पीछे भारी जन समूह उमड़ पड़ा। 15 जनवरी को शहीदों की अन्त्येष्टि के बाद कामरेड चन्द्रसिंह गढ़वाली ने टिहरी को राजशाही से आजाद होने की घोषणा कर दी थी। 16 जनवरी को आयोजित विशाल जन सभा में देहरादून से कामरेड बृजेन्द्र गुप्ता, कांग्रेसी नेता महावीर त्यागी, नरदेव शास्त्री आदि नेताओं ने भी भाग लिया था। बाद में टिहरी रियासत का भारतीय गणतंत्र में विलय कर लिया गया।
*स्वतंत्र भारत में देहरादून का वामपंथी आंदोलनः*
ब्रिटिश काल से ही देहरादून में चाय, चूना, बल्ब एक प्रमुख उद्योग रहा। यहाँ काम करने वाले कामगारों के हितों के मुद्दे लेकर वामपंथी कम्युनिस्ट नेता लगातार काम कर रहे थे। बृजेन्द्र गुप्ता उस समय अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख नेतृत्वकारी साथी थे। देश के विभाजन के बाद पाकिस्तान के पंजाब प्रांत व नार्थ वेस्ट फ्रंट से बहुत से शरणार्थी यहाँ आये। कुछ पूर्वी पाकिस्तान, जो अब बंगला देश है, वहाँ से भी यहाँ शरणार्थी आ कर बसे। इनमें से कुछ लोग प्रगतिशील वाम आंदोलन से भी जुड़े, जिन्होंने आगे चलकर देहरादून के मजदूर आंदोलन को एक नई गति प्रदान की। इनमें कामरेड मेलाराम, अमरनाथ आनंद, द्वारिकानाथ धवन, पुष्पराज चबाक, सुनीलचंद दत्ता, निताई घोष, सी0 बी0 मेहता सरीखे लोग थे जो मजदूर एवं प्रगतिशील आंदोलन के चमकते सितारे रहे हैं। इनमें से कुछ लोग रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी(आर एस पी ) से भी जुड़े रहे। अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी का दफ्तर पल्टन बाजार में होता था जो बाद में सीपीआई का दफ्तर भी रहा। सन् 1964 में सीपीएम का गठन हुआ। कामरेड मेला राम, कामरेड दलजीत, कामरेड गुरजीत आदि नेतृत्वकारी साथियों ने यहाँ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की बागडोर संभाली। इसी दौरान कामरेड गौतम देव गर्ग पार्टी से जुड़े़। कामरेड गर्ग ने आजीवन कम्युनिस्ट आदर्शों को अंगीकार करके रखा है। । शुरुआती दौर में अफ्रीका हाउस कांवली रोड में पार्टी का केन्द्र स्थापित हुआ। गुडरिच चाय बागान में कामरेड मेलाराम ने वहाँ के कामगारों को संगठित किया, वहाँ के कामगार आज भी सीटू से जुड़े हैं। कांवली रोड के इस अफ्रीका हाउस में कामरेड दलजीत और गुरजीत रहा करते थे। यहीं मेलाराम का कामरेड पूरणचन्द से भी संपर्क हुआ जो बल्ब फैक्टी में काम करते थे जो बाद में कामगारों के बड़े नेता बने तथा अन्त तक सीपीएम से जुड़े रहे कई बर्षों तक हरवंशवाला के प्रधान भी रहे । साथी वीरेन्द्र भण्डारी को भी पार्टी की सदस्यता इसी केन्द्र से दी गई थी जिनका परिचय पार्टी से कामरेड गुरजीत ने करवाया। आगे चलकर भण्डारी जी सीटू मजदूर आंदोलन के अग्रिम पंक्ति के नेता बने । अफ्रीका हाऊस आज भी वहीं स्थित है ।80 के दशक से पूर्व कामरेड अर्जुन रावत के नेतृत्व में गन पाउडर फैक्टी यूनियन यहाँ के मजदूर आन्दोलन के विकास में उल्लेखनीय है बाद को उन्होंने जनवादी नौजवान सभा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।चन्द्रशेखर आजाद नगर जो कि सीपीएम का आधार क्षेत्र भी है नौजवान सभा ने इसे बसाया है ।
उन दिनों कुछ दिनों तक 1 तिलक रोड में नारंग साइकिल की दुकान से भी पार्टी केन्द्र चला। शायद साइकिल की दुकान के मालिक कामरेड मेलाराम के परिचित थे। सन् 1974 के दौर में कामरेड विजय रावत भी पार्टी के संपर्क में आ गये थे। लोकल बस स्टैण्ड के आफिस के निर्माण में डाईवर, कण्डक्टर यूनियन द्वारा पार्टी को बुनियादी सहयोग मिला। इस यूनियन के अध्यक्ष रहे महाबीर नेगी ने बहुत कम कीमत पर पार्टी के लिए वर्ष 1983 में कार्यालय उपलब्ध कराया जो पार्टी निर्माण का महत्वपूर्ण केन्द्र बना।कामरेड रावत के आने के बाद पार्टी का तेजी से विकास हुआ । इससे पूर्व आईडीपिल वीरभद्र ऋषिकेश में कामगार यूनियन के नेता कामरेड विपिन उनियाल के योगदान को भी कभी भुलाया नहीं जा सकता। वे शुरुआती देहरादून पार्टी के सेक्रेटरी भी रहे हैं। बर्ष 1982-83 में रास्ते की मांग को लेकर डुमरराव स्टेट के विरुद्ध कारबारी गाँव की ग्रामीण जनता का बहादुराना संघर्ष और उसमें पार्टी की नेतृत्वकारी भूमिका आज के पार्टी के निर्माण व किसान सभा के निर्माण का मुख्य आधार है। यूं कहें कि इस सम्पूर्ण क्षेत्र के विकास में यह आन्दोलन मील का पत्थर साबित हुआ ।कारबारी के इस जन संघर्ष में कामरेड विजय रावत, कामरेड भगवान सिंह पुण्डीर, गुसाईं सिंह जगवाण, कामरेड सजवाण, कामरेड राज शर्मा, पूरनचंद,कामरेड जगदीश राणा ,कामरेड सुभाष चटर्जी का योगदान भी याद करने योग्य है उन दिनों मैं स्वयं इस आन्दोलन का हिस्सा रहा । इस आन्दोलन का नेतृत्व कामरेड शिवप्रसाद देवली हो या कामरेड राजेंद्र पुरोहित हो वे जिलापंचायत अध्यक्ष तथा सहसपुर प्रमुख के रूप में कुशल नेतृत्व दे चुके हैं,तथा वे आज पार्टी के नेतृत्व की अग्रिम पांतों में हैं । इसी आन्दोलन की कामरेड माला गुरूंग कारबारी की पुनः प्रधान बनी व कामरेड सुधा देवली ,कामरेड अमरबहादुर शाही किसान सभा के नेता हैं तथा स्वर्गीय भगवती नैनवाल ने किसान सभा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान सदैव याद किया जाऐगा ।सन् 1983 के देहरादून का भट्टा मजदूर आन्दोलन में पार्टी की ऐतिहासिक भूमिका उल्लेखनीय है। इस आन्दोलन के दौरान सहसपुर थाना पुलिस की दमनात्मक कार्रवाई में मजदूर नेता वीरेंन्द्र भण्डारी तथा एस एफ आई के छात्रनेता अनन्त आकाश को पुलिसिया दमन का शिकार होना पड़ा। इस आंदोलन के कारण मजदूर वर्ग की ताकत के सामने तत्कालीन पर्वतीय विकास मन्त्री को माफी मांगनी पड़ी। आन्दोलन ने भट्टा मजदूरों के जीवन बदलने में महत्वपूर्ण योगदान दिया । 1988-089 में कांवली गांव जो हाल ही के दशकों तक सांमतशाही की जकड़ में था इससे मुक्ति के लिए पार्टी का संघर्ष उल्लेखनीय है ।इसी दौर में मंहगाई के खिलाफ जेल भरो आन्दोलन उल्लेखनीय है । सन् 1986 के ऐतिहासिक कर्मचारी आन्दोलन को नेतृत्व देने वाले साथी कामरेड डीपी भट्ट तथा कामरेड एस एस नेगी भी पार्टी के कतारों के ही हिस्से रहे हैं ।देहरादून तथा पर्वतीय क्षेत्र में पार्टी विस्तार में हेमवती नन्दन बहुगुणा का सन् 1982 तथा 083 लोकसभा चुनाव पार्टी को स्थापित करने में मील का पत्थर साबित हुआ क्योंकि इस चुनाव में पार्टी ने कम ताकत के बावजूद बेहतरीन कार्य कर जनता के बीच अपनी पहचान बनायी।पोलिट व्यूरो सदस्य कामरेड हरकिशन सिंह सुरजीत,कामरेड सुनीत चोपड़ा उस दौर में देहरादून पार्टी के सम्पर्क में थे । पार्टी के नेतृत्वकारी साथियों ने पंचायत प्रमुख के रूप में अनेक बस्तियो को बसाने में अपना योगदान दिया। इसी दौर में बसी अधोईवाला में अनेक बस्तियां तथा गांधी ग्राम, चन्द्रशेखर आजाद नगर, आकाशदीप, नई बस्ती चुक्खुवाला क्रिशियन कालोनी,आदि लम्बी फैहरिस्त हैं।जिसमें कामरेड सजवाण क भूमिका अग्रिणी रहि । सन् 1980 तथा सन् 1990 के दशक के दौरान मजदूर, किसान व नौजवान आंदोलन के साथ छात्र आंदोलन भी महत्वपूर्ण मुकाम पर था। एस0 एफ0 आई0 के गठन में प्रो0 वीरेन्द्र श्रीवास्तव, भगवती प्रसाद उनियाल, वेदिकावेद, दिनेश डौण्डियाल ,संतोष श्रीवास्तव ,कामरेड कलमसिंह लिंगवाल ,मोहन मन्दौलिया सरीखे नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है संगठन लम्बे समय तक दर्जनों छात्रसंघों का नेतृत्व किया छात्रहितों के अनेक संघर्ष जीते, उत्तराखण्ड आन्दोलन के दौरान सत्ता के दमन के खिलाफ मजबूती से कार्य किया । राज्य बनने के बाद सभावाला से दो किलोमीटर दूर तिपरपुर के ग्रामीण का बरबर दमन के खिलाफ पार्टी का संघर्ष अविस्मरणीय है इस संघर्ष का नेतृत्व करते हुऐ कामरेड कमरूद्दीन तथा उनके परिवार को पुलसिया दमन का सामना करना पड़ा तथा कामरेड कमरूद्दीन एक जन नेता उभर करके आये । सुरेन्द्र सजवाण आदि अनेक अनगिनत साथी आज भी कम्युनिस्ट आंदोलन के जाने पहचाने चेहरे बने हुये हैं। आज देहरादून में कामरेड पूरनचंद के नाम पर गांधी ग्राम में एक भवन है जहाँ से सीपीएम राज्य मुख्यालय चलता है वर्तमान में पार्टी का नेतृत्व कामरेड राजेन्द्र सिंह नेगी कर रहे हैं ।
*अन्त में वर्तमान में राजनैतिक परिस्थितियां प्रतिकूल होने के बावजूद भी कम्युनिस्टों के लिए आगे बढ़ने की पूरी संभावनायें बनी हुई हैं।*

