उत्तराखंडदेहरादून

संस्कृत दिवस (श्रावणी पूर्णिमा/रक्षाबंधन) पर विशेष : डॉ राम भूषण बिजल्वाण।

देहरादून : “भारतस्य प्रतिष्ठे द्वे संस्कृतं संस्कृतिस्तथा”

भारतीय ज्ञान परंपरा को संस्कृत भाषा और उसका बृहद् इतिहास ही परिपुष्ट करता है। भारत जाना ही जाता है अपनी संस्कृति और संस्कृत के लिए। संस्कृत सिर्फ़ देवभाषा या भारतीय भाषा तक ही सीमित नहीं है अपितु प्राचीन भाषाओं में एक समृद्ध भाषा और विश्व की अनेक भाषाओं की जननी है।

बृहदारण्यक उपनिषद् कहता है – संस्कृत भाषा सम्यक् राजा और परब्रह्म है “यथा वाग्वे सम्राटपरब्रह्म”। विश्व के प्रथम ग्रन्थ ऋग्वेद से स्पष्ट होता है कि संसार की सबसे परिष्कृत, परिमार्जित और वैज्ञानिकी भाषा यह देवभाषा संस्कृत ही है।

वाक्यपदीयकार आचार्य भर्तृहरि कहते हैं- ऐसा कोई प्रत्यय नहीं है जिसे संस्कृत के माध्यम से न बोला जा सके। सभी विचार अर्थात् प्रत्यय शब्दों के माध्यम से ही भाषित होते हैं “सर्वं शब्देन भाषते”।

संस्कृत भाषा के संरक्षण और आम जनमानस के प्रचलन में लाने हेतु इसके लिए प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि (रक्षाबंधन) को संस्कृत दिवस के रूप में मनाया जाता है। क्योंकि प्राचीन काल में वेद, वेदांगों और विभिन्न शास्त्रों का अध्ययन श्रावण पूर्णिमा से ही प्रारम्भ होता था अर्थात् यह शिक्षण सत्र को प्रारम्भ करने की महत्वपूर्ण तिथि थी। इसलिए गुरु-शिष्य परम्परा के सभी लोग इस दिवस को महोत्सव के रूप में मनाते आए हैं।

भारत सरकार ने इस परम्परा को ध्यान में रखते हुए इसे पुनः प्रारम्भ करके जुलाई 1969 को संस्कृत दिवस के रूप में मान्यता दी थी। पुनः इसे श्रावण पूर्णिमा को संस्कृत दिवस के रूप में स्वीकारा गया।

NEP-2020 संस्कृत भाषा के सर्वविध विकास के लिए इसे संवैधानिक भाषा के रूप में, शास्त्रीय भाषा, जनभाषा तथा भारतीय ज्ञान परंपरा के रूप में स्वीकारते हुए उसके साहित्य को मुख्य आधार मानते हुए इसका प्रचार प्रसार कर रही है। त्रिभाषा सूत्र का वैकल्पिक रूप में संस्कृत को मान्यता देना उसको जनभाषा व लोकभाषा के रूप में विकसित करने हेतु NEP-2020 के अनेक अथक प्रयास जारी हैं।

उत्तराखण्ड सरकार ने पहले ही संस्कृत के संरक्षण हेतु उसे द्वितीय राजभाषा के रूप में मान्यता दी है और संस्कृत दिवस को बड़े रूप में प्रदर्शित करने हेतु अनेकों कार्यक्रम आयोजित किये हैं। संस्कृत दिवस हमे स्मरण कराता है कि अतीत ही नहीं अपितु वर्तमान और भविष्य की प्रमुख भाषा के रूप में संस्कृत ही है। नई पीढ़ी को आकर्षित करने के लिए संस्कृत के ज्ञान भण्डार को NEP-2020 नें अपने पाठ्यक्रमों में समायोजित किया है जैसे चिकित्सा प्रणाली, गणित, विज्ञान, अर्थशास्त्र, नाट्यशास्त्र और साहित्यशास्त्र आदि से संबंधित ग्रंथों को विशेष महत्व दिया है।

संस्कृत भाषा आज भी हमारे देश के कई गांवों में बोले जाने वाली आम भाषा है जैसे कर्नाटक का मत्तूर गाँव में। अनेक विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों तथा शिक्षण संस्थानों में इस भाषा को बढ़ावा देने हेतु विभिन्न प्रयास जारी हैं। संस्कृत दिवस की प्रासंगिकता को यदि देवभूमि उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यहां वर्ष 2011 से संस्कृत भाषा को द्वितीय राजभाषा का दर्जा प्राप्त है इसी क्रम में उत्तराखंड सरकार द्वारा वर्तमान में संस्कृत शिक्षा के व्यापकीकरण हेतु नित नए प्रयास किया जा रहे हैं जिसमें इस संस्कृत दिवस पर प्रदेश के 13 जिलों में 13 संस्कृत ग्रामों का शुभारंभ प्रदेश के मुखिया के करकमलों से होना एक सुखद अनुभूति है उम्मीद है कि आने वाले समय में इन 13 संस्कृत ग्रामों में रहने वाले सभी आमजन संस्कृत भाषा में वार्तालाप करते हुए दिखेंगे जिससे निश्चित रूप से संस्कृत दिवस और संस्कृत भाषा की प्रासंगिकता और बढ़ेगी पर संस्कृत के समग्र विकास के लिए इतनाभर पर्याप्त नही है इसके अलावा अन्य प्रयास होने अभी बाकी है जिसमें मूल रूप से संस्कृत शिक्षा उन्नयन के प्रारंभिक केंद्र संस्कृत गुरुकुलो विद्यालय- महाविद्यालयों का सार्वभौमिक विकास उनकी मूलभूत अवसंरचना अवस्थापना छात्र-शिक्षक-विषय का ठीक अनुपात की तरफ अभी अधिक कार्य करने की आवश्यकता है जिसके लिए संस्कृत शिक्षा विभाग महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है । अंत में एक बात अवश्य कहूंगा कि आज आवश्यकता है सभी आमजन संस्कृत भाषा शिक्षा के संवर्द्धन संरक्षण हेतु कृत संकल्पित होयें, क्योंकि सवाल सिर्फ संस्कृत भाषा या शिक्षा मात्र का नहीं प्रश्न है भारत और भारतीयता के संरक्षण एवं व्यापकीकरण का क्योंकि इनके मूल में संस्कृत ही है । इसलिए आइए इस रक्षाबंधन पर सभी बहिनें एक राखी अपनी सभ्यता- संस्कृति और संस्कृत की रक्षा के लिए अपने भाइयों की कलाई पर जरूर बांधें क्योंकि

संस्कृत हमे सिखाती है की सदैव अपनी जड़ों से जुड़े रहना चाहिए “यदा संस्कृतं रक्षाम: तदा संस्कृति: रक्षिता भवति।” ।

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