
उत्तराखंड : हम बस्ती बचाओ आन्दोलन की ओर से उपरोक्त सन्दर्भ में पर्यावरण बहाली जैसे (रिस्पना-बिन्दाल प्रोजेक्ट) के नाम पर गरीब बस्तियों को निशाना बनाया जा रहा है जबकि बड़े अतिक्रमण (विधानसभा, पुलिस कॉलोनी, दूरदर्शन, गुरू राम राय प्रभावशाली लोग आदि) आज भी अतिक्रमण के तहत चिन्हित नहीं किये गये है, यह स्पष्ट करता है कि प्रभावशाली संस्थाएँ एवं लोगों इस दायरे से हरेक सर्वे में बाहर रखा गया है तथा केवल और केवल गरीबों को चिन्हित कर उन्हें बेदखल करने की साजिश चल रही है ।हमने सभी उचित माध्यमों से इस सन्दर्भ में घोर आपत्ति व्यक्त की है ।
उत्तराखण्ड सरकार एवं उसके आला अधिकारी हरित अधिकरण (NGT) नई दिल्ली एवं उच्च न्यायालय उत्तराखण्ड नैनीताल में रिस्पना-बिन्दाल नदियों के किनारे बसे केवल गरीबों को हटाने की सूची देकर फ्लडजोन मुक्त करने कि बात कर रहे हैं, ठीक दूसरी ओर उत्तराखण्ड सरकार इसी फ्लडजोन पर चार लाईन एलिवेटेड रोड़ जिसकी दोनों नदियों में लम्बाई लगभग 30 किलोमीटर है, जिसकी अनुमानित लागत 6500करोड़ बताई जा रही है, इस रोड़ से कम से कम 5 हजार से भी अधिक परिवार प्रभावित होने की सम्भावना है जिसमें अब तक लगभग 26 सौ परिवारों को सूचीबद्ध किया जा चुका है, लगभग 13 सौ परिवारों को अवैध घोषित करने के लिये नगरनिगम देहरादून द्वारा नोटिस जारी कर दिए हैं, इस प्रकार एलिवेटेड रोड़ एवं कोर्ट के नाम पर स्थाननीय प्रशासन एवं नगरनिगम खुलेआम सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों एवं भूमि अधिनियम 2013 का खुलकर उल्लघंन कर रहा है, सरकार की नियत इस सन्दर्भ में साफ नहीं तथा सम्पूर्ण मामलों में दोहरी है ।
बस्तियों के अतिक्रमण को “अवैध” बताया जा रहा है, जबकि सरकारी/निजी प्रोजेक्ट्स जैसे एलिवेटेड रोड़, स्मार्ट सिटी आदि को “विकास” का लेबल दिया जा रहा है।
स्थानीय मीडिया झुग्गियों को फोकस करते हुऐ, स्थापित संस्थानों के अतिक्रमण को “सिस्टम का हिस्सा” मानकर नज़रअंदाज़ कर रहा है जोकि अन्तत; गरीबों को ही नुकसान पहुंचाऐगा ।
हर चुनाव से पहले हमारी राज्य सरकार वोट बैंक के लिए वादे करती है,बाद को भूमि माफिया-नीति निर्माता गठजोड़ द्वारा बेदखली की जाती है। हमारे राज्य में ऐसे मामलों की लम्बी फेहरिस्त हैं।यह भी संज्ञान में है कि हमारे राज्य में ज़मीन के दस्तावेज़ों की जटिलता और प्रशासनिक देरी का फायदा उठाकर गरीबों के अधिकारों को लंबित रखा जाता है। इस प्रकार हर तरफ से बस्तीवासी उपेक्षित हैं, इन बस्तियों में दलित/अल्पसंख्यक बस्तियों को “आसान टार्गेट” मानकर उजाड़ा जाता रहा है।
सभ्यता की कसौटी यह है कि उसका सबसे कमजोर व्यक्ति कितना सुरक्षित है।
इसलिये बस्ती बचाओ आन्दोलन देहरादून में हर स्तर पर इनकी मांग उठा रहे हैं ताकि गरीबों के खिलाफ हो रही साजिश के खिलाफ एकजुटता के साथ संघर्ष कों निर्णयक बनाया जा सके ।
हम जनप्रतिनिधि के रूप में इस सन्दर्भ आपसे निम्नलिखित अपेक्षा करते हैं ;-
1. उत्तराखण्ड सरकार अपने वायदे के अनुरूप सभी बस्तिवासियों को मालिकाना हक दे ।
2. एनजीटी एवं उत्तराखण्ड हाईकोर्ट के नाम पर सभी गरीबों को जारी बेदखली के नोटिस वापस लिये
जायें ।
3. बिन्दाल – रिस्पना नदियों के ऊपर पर्यावरण विरोधी, गरीब जनता को बेदखल करने वाली एलिवेटेड
रोड़ निरस्त की जाये ।
4. एलिवेटेड रोड़ पर खर्च होने वाले 6500करोड़ रुपये जनता के चहुमुखी विकास शिक्षा, स्वास्थ्य,रोजगार
तथा सार्वजनिक परिवहन पर खर्च किया जाये ।
आशा है कि आप उपरोक्त सन्दर्भ में राज्य के मुख्यमंत्रीजी को लिखेंगे, कृत कार्यवाही की प्रति भी उपलब्ध करवायेंगे।

