
नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के 10 प्राइवेट डेंटल कॉलेजों पर एडमिशन में अनियमितताओं के लिए प्रत्येक पर 10-10 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है. जस्टिस जे. के. माहेश्वरी और विजय बिश्नोई की पीठ ने 18 दिसंबर, 2025 को दिए गए अपने फैसले में कहा कि जो तथ्य सामने आए हैं वे बेहद चौंकाने वाले और गंभीर हैं, जिन्हें किसी भी परिस्थिति में माफ नहीं किया जा सकता।
शीर्ष अदालत ने कहा, “कॉलेजों ने 10+5 परसेंटाइल से परे छात्रों को प्रवेश देकर 2007 के नियमों का जानबूझकर उल्लंघन किया और घोर अवैधता की, जो कड़ी सजा के पात्र हैं. इसके अलावा, राजस्थान सरकार ने भी बिना किसी कानूनी अधिकार के छूट प्रदान की और केंद्र सरकार व डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया (DCI) के फैसलों के बारे में कॉलेजों को समय पर सूचित करने में विफल रही।
पीठ ने निर्देश दिया कि शैक्षणिक सत्र 2016-17 के बीडीएस (BDS) प्रवेशों में कानूनी प्रक्रियाओं का पालन न करने के लिए सभी संबंधित कॉलेज 10-10 करोड़ रुपये और राजस्थान सरकार 10 लाख रुपये का जुर्माना जमा करें. यह राशि फैसले की घोषणा की तारीख से आठ सप्ताह के भीतर ‘राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण’ (RSLSA) में जमा की जानी चाहिए।
अदालत ने प्रवेश प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं पाईं, जहां राजस्थान सरकार ने बिना किसी अधिकार के बीडीएस छात्रों के लिए आवश्यक न्यूनतम नीट (NEET) पर्सेंटाइल में पहले 10 प्रतिशत और फिर 5 प्रतिशत की कटौती कर दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “यह कदम स्पष्ट रूप से अवैध था और इसके आधार पर दिए गए प्रवेश वैध नहीं माने जा सकते. अधिक से अधिक राजस्थान सरकार केंद्र सरकार से अनुरोध कर सकती थी या डीसीआई (DCI) को सिफारिश भेज सकती थी, लेकिन राज्य सरकार ने नियमों को अपने हाथ में लेकर कटौती की, जिसे किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
न्यूनतम पात्रता मानदंडों में इस कटौती ने ऐसे छात्रों के लिए डेंटल कॉलेजों में प्रवेश का रास्ता साफ कर दिया, जो DCI (डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया) द्वारा निर्धारित योग्यता पूरी नहीं करते थे. इसके अलावा, संबंधित कॉलेजों ने इस ’10+5 प्रतिशत’ की छूट की सीमा से भी बाहर जाकर छात्रों का दाखिला लिया।
पीठ ने कहा कि जहां राजस्थान सरकार द्वारा दी गई 10+5 परसेंटाइल तक की छूट पहले से ही बहुत अधिक (Excessive) थी, वहीं निजी कॉलेजों ने हर सीट भरने के अपने लालच में सरकार द्वारा दी गई उस छूट की सीमा को भी पार कर दिया और उससे भी कम योग्यता वाले छात्रों को प्रवेश दे दिया।
अदालत ने कहा, “इन कॉलेजों ने छात्रों को दाखिला देते समय NEET मेरिट लिस्ट के बजाय केवल उनके 12वीं (10+2) के अंकों पर भरोसा किया. इसका नतीजा यह हुआ कि शून्य और ‘नेगेटिव’ अंक पाने वाले छात्रों को भी प्रवेश मिल गया. इस प्रकार, 10+5 प्रतिशत की छूट से भी बाहर जाकर दिए गए दाखिले पूरी तरह से अस्थिर और अवैध थे. यह पूरी कवायद देश में प्रभावी दंत चिकित्सा शिक्षा के लिए DCI द्वारा निर्धारित नियमों और विनियमों का मज़ाक उड़ाने जैसी थी।
पीठ ने कहा कि कॉलेजों ने 2007 के नियमों का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन किया था. राजस्थान सरकार और निजी कॉलेजों ने कानून का पालन नहीं किया, साथ ही डीसीआई (DCI) और केंद्र सरकार की ओर से भी कुछ खामियां रहीं. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने शैक्षणिक वर्ष 2016-17 के लिए नीट (NEET) पर्सेंटाइल में छूट के बाद प्रवेश लेने वाले छात्रों को राहत दी और उनकी बीडीएस डिग्री को नियमित कर दिया।
मुख्य याचिका में 59 छात्रों के वकील ऋषभ संचेती ने कहा: “यह एक ऐतिहासिक फैसला है जहां सुप्रीम कोर्ट ने पूर्ण न्याय करने के लिए अनुच्छेद 142 के तहत अपनी पूर्ण शक्ति का उपयोग किया है. इसने सैकड़ों छात्रों के करियर को बचाया है. साथ ही, कोर्ट ने 100 करोड़ रुपये से अधिक का अभूतपूर्व जुर्माना लगाने का निर्देश दिया है, जिसका उपयोग 5 न्यायाधीशों की समिति की निगरानी में राजस्थान राज्य के नारी निकेतनों, वृद्धाश्रमों और बाल देखभाल संस्थानों के लिए किया जाएगा।



