उत्तराखंड

क्रांतिकारी शहीद चे – गेवारा की 95वीं शहादत दिवस पर क्रान्तिकारी सलाम।

ये चे की प्रसिध्दी बताती है कि वे हर जगह मौजूद हैं ,वे मार्क्सवादी विचारक के साथ युवाओं के प्रेणा के प्रतीक पहले भी थे ,आज भी हैं तथा भबिष्य में भी रहेंगे ।वे ऊर्जावान के साथ ही हर मुश्किल से टकराने की हिम्मत रखने वाले क्रान्तिकारी थे । जिस प्रकार शहीदे आजम भगतसिंह भारतीय युवाओं के आईकोन हैं ,ठीक उसी तरह चे दुनियाभर के युवाओं के नायक हैं । शहीदे आजम भगत सिंह एवं उनके साथियों ने एक बेहतरीन समाज की लडा़ई में अपना सर्वस्व न्यौछावर किया तथा चे ने‌ साम्राज्यवादी अमेरिका से लड़ते हुऐ अपने देश को आजाद किया बल्कि वहाँ पर समाजवाद पर विश्वास रखने वाली सरकार स्थापित की ।

अर्नेस्तो चे गेवारा ,जिन्हें दुनिया चे के नाम से जानती है ,का जन्म अर्जेंटीना के सेजारियो कस्बे में 14 जून , 1928 को हुआ था । उन्होंने क्यूबाई क्रान्ति में प्रमुख भूमिका निभाई । चे का नाम सारे संसार में क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रतीक बन गया है । अपनी चिकित्सकीय शिक्षा के दौरान उन्होंने पूरे लातिन अमरीका का मोटर साइकिल से दौरा किया ,इस दौरान हुए जनगण की गरीबी और दुर्दशा को करीबी से देखा जिसने उन्हें झकझोर दिया ।उन्होंने इसके लिये लैटिन अमरीकावासियों की दुर्दशा के लिए एकाधिकारवाद , नव- उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद जिम्मेदार को सीधेतौर पर जिम्मेदार माना ।

चे-गवारा ने अपनी उपनिवेशवाद -विरोधी मुहिम ग्वाटेमाला से शुरू की और 1956 में मैक्सिको सिटी में राउल कास्त्रोऔर फिदेल कास्त्रो से मुलाक़ात के बाद क्यूबा की 26 जुलाई की क्रांति में शामिल हो गये ।क्यूबा के तानाशाह बतिस्ता के खिलाफ 1957 से 1959 तक चले इस जन-युद्ध का अपना ही अदभुत इतिहास है । एक तरफ अमरीका के सरपरस्त बतिस्ता के पास अपनी निरंकुश सेना तथा अमरीकी हथियार के जखीरे मौजूद थे‌,यह ऐतिहासिक एवं आश्चर्यजनक ही था कि डाक्टरों ,इंजीनियरों और मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों ने जनता के सहयोग और हथियारबंद गुरिल्ला युद्ध के माध्यम न केवल बतिस्ता की सेना को पराजित किया अपितु अमेरिकी साम्राज्यवाद को‌ पीछे हटने के लिए मजबूर किया । 1 जनवरी 1959 को क्यूबा में एक क्रांतिकारी सरकार की घोषणा कर दी गई ।उल्लेखनीय है कि क्रान्ति से पहले न तो क्रांति के इन नायकों का वहां की कम्युनिस्ट पार्टी से कोई सीधा सम्बन्ध था और न ही इन्होने मार्क्सवाद को क्रांति का आधार बनाया था ।किन्तु वे मार्क्सवादी विचारधार से भलीभांति परिचित थे । क्रांति के तुरंत बाद हुई गहरे मंथन से क्रांति के इन नायकों ने क्यूबा में मार्क्सवादी विचारधारा के आधार पर समाजवाद की स्थापना का लक्ष्य तय किया । यह अलग बात थी कि उन्होंने क्यूबा में अपनी जमीन, अपनी प्रकृति ,अपनी परम्परा और अपने इतिहास को ,अपनी राष्ट्रीयता और लोकतंत्र को मार्क्सवाद के अमूर्त सिद्धांतों के मुकाबले प्राथमिक माना ।यानि कि उन्होने सिध्दान्त को अपनी देश व काल कि परिस्थिति के अनुरूप लागू‌ किया । दुनियाभर से समाजवादी व्यवस्था को नेस्तनाबूद करने का दिवास्वप्न देखने वाले अमेरिकी साम्राज्यवाद की नाक के ठीक नीचे क्यूबा एवं अन्य लातिन अमरीका के देश समाजवाद की श्रेष्ठ उपलब्धियों के साथ पतानोंमुख साम्राज्यवाद को निरन्तर चुनौती दे रहे हैं ।

चे ग्वैरा को क्यूबा की प्रथम समाजवादी सरकार ने वित्त मंत्रालय संभालने की जिम्मेदारी दी किन्तु उनके सामने लैटिन अमेरिका के साथ , पूरी दुनिया में क्रांति के विचार को ले जाने का लक्ष्य ज़िन्दा था । चे भारत भी आये थे, किन्तु यहाँ के दिल्ली ,कलकत्ता जैसे शहरों में एक तरफ चंद इलाकों में उच्च कोटि की अमीरी और शेष बहुमत जनता की गरीबी देख कर उनका मन खिन्न था ,वे प्रधानमन्त्री नेहरूजी से भी मिले । अपनी भारत यात्रा के अनुभवों को अपनी डायरी में विस्तार के साथ लिखा । चे पर क्रान्ति की धुन सवार थी । क्यूबा के बाद कांगो में सत्ता के विरुद्ध जनता का नेतृत्व किया । तत्पश्चात बोलीविया पहुँच कर क्रांतिकारी युवाओं को वहाँ के जंगलों में प्रशिक्षण दे रहे थे ,तभी वहां की सेना ने उन्हें घेर लिया और सेना से गुरिल्ला युद्ध करते हुए उनके सीने में गोली लगी और 9 अक्टूबर , 1967 को , जबकि उनकी आयु मात्र 39 वर्ष थी , क्रांति का वह महान हिरावल सपूत शहीद हो गया .

चे-गुवेरा भले ही इस दुनिया में नहीं हैं , किन्तु वे आज भी दुनिया के सर्वोच्च क्रांतिकारियों और युवा पीढ़ी के बीच प्रेरणा देनेवाले नायकों की गिनती की सबसे अग्रिम कतारों में हैं ,चे को कविता और संगीत से बहुत प्रेम था । अपनी पुस्तक ‘गुरिल्ला युद्ध के नियम ‘और डायरी के अलावा क्यूबा के चिकित्सकों की विश्वव्यापी क्रांतिकारी चिकित्सा मुहिम के कारण चे आज भी एक ज़िंदा क्रांतिकारी मिसाल बने हुए हैं । 95 शहादत पर अमर शहीद चे को क्रांतिकारी अभिवादन ! लाल सलाम ।

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