
देहरादून। उत्तर प्रदेश का नोयडा, हरियाणा का गुडगाँव, उत्तराखण्ड का रुद्रपुर और सेलाकुई, मौहब्बेवाला ये नाम अलग-अलग राज्यों में हैं, लेकिन इनसे जुड़े श्रमिक आन्दोलनों की जड़ें एक जैसी हैं: जीने लायक मजदूरी, कानूनी सुरक्षा और सामूहिक सौदेबाजी की ताकत। हाल के वर्षों में यहाँ छिटपुट हड़तालें, धरने और कानूनी लड़ाइयाँ हुई हैं। लेकिन सवाल यह है कि इन आन्दोलनों को सही दिशा, व्यापक चेतना और वैज्ञानिक संगठनात्मक ढाँचा क्यों नहीं मिल पा रहा? इस लेख में हम समझेंगे कि चार श्रम संहिताएँ किस तरह पूंजीपतियों के हितों को आगे बढ़ाती हैं, मोदी सरकार की भूमिका क्या है, और अराजक तत्वों के दखल से बचते हुए एकजुट, अनुशासित आन्दोलन की रूपरेखा क्या हो सकती है।
पहला पहलू : चार श्रम संहिताएँ – पूंजी के लिए स्वतंत्रता, श्रमिक के लिए बंधन, 2019-20 में केन्द्र सरकार ने 29 केन्द्रीय श्रम कानूनों को चार संहिताओं में बाँट दिया – वेतन संहिता, औद्योगिक संबंध संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता, और व्यावसायिक सुरक्षा संहिता। सरकार और उद्योगपति कहते हैं कि इससे कारोबारी माहौल आसान होगा, निवेश बढ़ेगा और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। लेकिन तथ्य यह है कि जिसे “सुधार” कहा जा रहा है, वह वास्तव में श्रमिकों की सौदेबाजी की ताकत को तोड़ने की एक सुनियोजित कोशिश है।
पुराने कानूनों के तहत किसी भी ट्रेड यूनियन को सामूहिक सौदेबाजी का अधिकार था-यानी मजदूर सीधे अपनी माँगें रख सकते थे। नई संहिता में केवल “पंजीकृत” संघों को मान्यता दी जा सकती है, और यह पंजीकरण नियोक्ता के अनुकूल संघ को तरजीह देने का रास्ता खोलता है। असली मजदूर संघों को दरकिनार करके कंपनी के बनाए हुए “दबंग संघों” को बैठक में बिठाया जा सकता है। हड़ताल के अधिकार पर भी शिकंजा कसा गया है: पहले छह सप्ताह का नोटिस था, अब केवल 14 दिन का , लेकिन साथ ही “आवश्यक सेवा” के दायरे में कई उद्योग ला दिए गए हैं, जहाँ हड़ताल लगभग अवैध हो जाती है। यानी जहाँ सबसे अधिक शोषण होता है, वहीं हड़ताल करना सबसे मुश्किल बना दिया गया है।
वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो ये संहिताएँ श्रमिकों को अनुशासित, असंगठित और असुरक्षित रखने का एक हथियार हैं। भारत में 95 प्रतिशत श्रमिक असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं – जहाँ न्यूनतम मजदूरी भी पूरी नहीं मिलती। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने भी चिंता जताई है कि “जीने लायक मजदूरी” (living wage) का प्रावधान तो संहिता में है, पर इसकी गणना का कोई पारदर्शी फार्मूला नहीं दिया गया। असल में, यह श्रमिकों को उद्योगपतियों की “दया” पर छोड़ने का एक तरीका है – एक ऐसा रिश्ता जहाँ एक तरफ पूंजी (मशीनें, कच्चा माल, भवन) लगातार बढ़ती है और दूसरी तरफ मेहनत की कमाई न्यूनतम स्तर पर अटकी रहती है।
दूसरा पहलू: नोयडा, गुडगांव,रुद्रपुर, सेलाकुई, मौहब्बेवाला-बिखरे हुए आन्दोलनों की कमजोरियाँ, इन चारों स्थानों पर श्रमिक उठे। नोयडा, गुडगाँव में 21,000 रुपये न्यूनतम मजदूरी, ठेका प्रथा खत्म करने और ईएसआई-ईपीएफ की माँग उठी। रुद्रपुर में वेतन विसंगति और सुरक्षा मानकों के खिलाफ मुकदमे हुए। सेलाकुई में कंपनी बंद होने के बाद बकाया वेतन और पुनर्बहाली की लड़ाई अब भी जारी है। विण्डलास में हड़ताल , लेकिन मजदूरी अभी भी न्यूनतम स्तर पर अटकी है।
अब इन आन्दोलनों की असली तस्वीर देखें – जो कोई भी शोषित-वर्ग के संघर्षों का अध्ययन करता है, वह तीन बड़ी कमियाँ पाएगा। एक, ये आन्दोलन अधिकतर स्थानीय और छिटपुट रहे। कोई राष्ट्रीय समन्वय नहीं रहा । एक कारखाने की हड़ताल दूसरे कारखाने को पता भी नहीं चलती। मालिक आसानी से एक जगह दबाव बना सकते हैं, क्योंकि उन्हें कहीं और विरोध का डर नहीं होता। दो, कई जगहों पर बाहरी अवसरवादी नेता और तथाकथित अराजकतत्व आन्दोलन में घुस आए। ये लोग अपना निजी एजेंडा – जैसे तथाकथित group का नाम रोशन करना या व्यक्तिगत लाभ – लेकर आते हैं, जिससे मुख्य लडाई व माँगें धुंधली पड़ जाती हैं तथा मालिकों को राहत मिल जाती है और श्रमिकों पर दमनकारी कदम उठाकर वे टूट जाते हैं, और मुख्य ट्रेड यूनियनों का आन्दोलन नहीं बनने दिया जाता। नोयडा, गुडगाँव में इस अतिवादी संगठनों ने ऐसा ही किया और श्रमिक बीच में फँस गये,, संगठित मजदूर आन्दोलन खासकर सीआईटीयू ने हस्तक्षेप कर स्थिति और अधिक बिगडने से रोकी!
व्यवस्था की देन है जहाँ श्रमिक को माल के समान माना जाता है – एक “संसाधन” जिसे कम से कम लागत पर अधिकतम उत्पादन निकालने के लिए इस्तेमाल किया जाए। बिना वर्ग-चेतना और संगठन के, ये आन्दोलन कभी भी मूलभूत परिवर्तन नहीं ला सकते।
तीसरा पहलू: एकजुट, अनुशासित और मुद्दा-केन्द्रित आन्दोलन की रूपरेखा, सफल आन्दोलन की चार नींवें होती हैं – और ये नींवें अकेले नेताओं के भाषणों से नहीं, बल्कि जमीन पर मेहनत से बनती हैं।
पहला, मुद्दा-केन्द्रियता – एक साथ बहुत सी माँगें रखने से बात बिखर जाती है। आन्दोलन को दो-तीन स्पष्ट, मापने योग्य माँगों पर टिकना चाहिए। जैसे: “राष्ट्रीय फ्लोर मजदूरी 15,000 से बढ़ाकर 26,000 रुपये करो, और सभी श्रमिकों को ईएसआई-ईपीएफ अनिवार्य दो।” जब माँग साफ होती है, तो उसे समझना और उसके लिए खड़ा होना आसान होता है।
दूसरा, संगठनात्मक ढाँचा – जैसे 2020-21 के किसान आन्दोलन में संयुक्त किसान मोर्चा बना था, वैसे ही श्रमिकों को भी एक गैर-पक्षीय, संघ-निरपेक्ष लेकिन समन्वित मोर्चा बनाना होगा। सभी ट्रेड यूनियनों को अलग-अलग चलने का अधिकार है, लेकिन संघर्ष के समय एकजुट होना जरूरी है। इसके लिए मुद्दा आधारित एक संयुक्त ट्रेड यूनियन समन्वय समिति बनानी चाहिए, जहाँ हर संघ का प्रतिनिधित्व हो लेकिन निर्णय सामूहिक हों।
तीसरा, व्यापक चेतना – केवल मजदूरी बढ़ाने से श्रमिकों की असल समस्या हल नहीं होती। जब तक श्रमिक यह नहीं समझते कि उनकी मेहनत से पैदा हुआ अधिशेष (मुनाफा) मालिक कैसे हड़प लेता है, तब तक वे केवल टुकड़ों के लिए लड़ते रहेंगे। उन्हें संविधान के अनुच्छेद 19(1)(c) (संघ बनाने का अधिकार), अंतर्राष्ट्रीय श्रम मानकों, और अपनी ताकत के बारे में शिक्षित होना चाहिए। चेतना का मतलब है – यह पहचानना कि दुश्मन सिर्फ एक कंपनी का मालिक नहीं है, बल्कि वह तंत्र है जो सभी मालिकों को एक साथ श्रमिकों के खिलाफ खड़ा करता है।
चौथा, अराजकता से बचाव – आन्दोलन की कार्यकारिणी में स्वयं श्रमिक संगठनों की हर स्तर पर जवाबदेही हो। तभी कोई अवसरवादी या माफियाटाइप तत्व आन्दोलन को हाईजैक नहीं कर पाएगा।
चौथा पहलू: मोदी सरकार की भूमिका – राज्य पूंजी का प्रबंधक है
सरकार ने इन चार संहिताओं को पारित तो कर दिया, लेकिन अब तक इनके नियम पूरी तरह अधिसूचित नहीं हुए हैं। फिर भी, राज्यों को इनके अनुसार नियम बनाने के निर्देश दे दिए गए हैं। आलोचकों का कहना है कि श्रम सुधार पर चर्चा के लिए बुलाई गई संयुक्त समितियों में श्रमिकों के बजाय उद्योगपतियों को अधिक बार बुलाया गया। यह कोई संयोग नहीं है। असल में राज्य – चाहे वह किसी भी नाम से बने – उस व्यवस्था का एक अंग है जो पूंजी के हितों की रक्षा करता है। चाहे भारत हो या अमेरिका, श्रम कानूनों को इस तरह ढाला जाता है कि उद्योगपतियों को सस्ता, लचीला और संगठन रहित श्रम मिलता रहे। यूरोप के अधिकांश देशों में न्यूनतम मजदूरी मध्यम वर्ग की जीवनरेखा के करीब होती है (लगभग 1,400-2,000 यूरो प्रति माह), जबकि भारत में अधिकांश असंगठित श्रमिक 8,000-10,000 रुपये प्रति माह पर गुजर-बसर कर रहे हैं – और उस पर भी अनियमित। चार संहिताएँ इस अंतर को और बढ़ाएँगी, क्योंकि ये श्रमिकों को कानूनी ढाल से वंचित करती हैं। मोदी सरकार ने साफ कर दिया है कि वह किसकी रोटी सेकती है – उद्योगपतियों की। श्रमिकों को बस “जितना मिले खाओ” वाली स्थिति में धकेला जा रहा है।
बिखराव मुक्त, वैज्ञानिक आन्दोलन
श्रमिक आन्दोलनों को अब छिटपुट हड़तालों और दलाल नेताओं के चक्कर से बाहर आना होगा। जरूरत है एक राष्ट्रीय समन्वय की – जैसे किसानों ने किया था। निर्धारित दिन पर सभी औद्योगिक क्षेत्रों में एक साथ धरना, संहिताओं के खिलाफ कानूनी सहायता शिविर, सोशल मीडिया और वैकल्पिक मीडिया पर कार्यस्थलों की असली तस्वीर दिखाना, और हर विधानसभा क्षेत्र में सांसद-विधायकों को ज्ञापन देना – ये तात्कालिक कदम हैं। पर दीर्घकाल में, श्रमिकों को अपनी अलग ताकत बनानी होगी – एक ऐसा संगठन जिसकी इतनी ताकत हो, वह किसी का मोहताज न हो जब तक मजदूर यह नहीं समझ लेता कि उसके हाथों ने जो उत्पादन किया, उस पर उसका सबसे पहला हक है, तब तक हर आन्दोलन या तो कुचल दिया जाएगा या अराजकता में बदल जाएगा। सही दिशा है – एक वैज्ञानिक दृष्टि जो मजदूरी से लेकर उत्पादन के साधनों तक के सवाल उठाए। सही संगठन है – अनुशासित, लोकतांत्रिक और मुद्दा-केन्द्रित। सही चेतना है – यह पहचान कि दुनिया दो हिस्सों में बँटी है: एक जो मेहनत करता है, एक जो मेहनत पर बैठता है। (“हर छोटी हड़ताल एक बीज है, लेकिन बीज को अंकुरित होने के लिए सही मिट्टी, पानी और धूप चाहिए – यानी सही दिशा, सही संगठन और सही चेतना। तभी आन्दोलन फल देगा – और वह फल केवल रोजी-रोटी नहीं, बल्कि सत्ता में हिस्सेदारी होगी।”यह लेख तथ्यात्मक सूचनाओं, श्रमिक हितों और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित है।



