
देहरादून : “23 मार्च 1931 को भगत सिंह , सुखदेव और राजगुरु के साथ फांसी पर चढ़ गए वै ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन‘ संगठन में थे । अंग्रेजी हुक्मरानों के खिलाफ भारत कै मुक्ति संघर्ष में शहीद हुए भगत सिंह को अविभाजित भारत के प्रमुख राज्य पंजाब की राजधानी लाहौर की जेल में फांसी पर चढ़ाया गया , उन्होंने लाहौर में ही अपने सहयोगी राजगुरु के साथ मिलकर ब्रिटिश पुलिस अफसर साण्डर्स को यह सोचकर गोलियों से भून था कि वही ब्रिटिश पुलिस अधीक्षक जेम्स स्कॉट है, जिसके आदेश पर साईमन कमीशन के बहिष्कार वाले आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे लाठीचार्ज में घायल होने के बाद लाला लाजपत राय का निधन हो गया , भगत सिंह एवं उनके क्रान्तिकारी साथियों ने लाहौर की दीवारों पर पोस्टर लगाकर खुलेआम घोषणा की थी कि उन्होंने लाला लाजपत राय की मौत का बदला ले लिया है ।हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन में शामिल और लाहौर षड़यंत्र केस-2 में अण्डमान निकोबार द्वीप समूह के सेलुलर जेल में “कालापानी ” की सज़ा भुगतकर जीवित बचे क्रान्तिकारी शिव वर्मा 1997 में निधन से एक वर्ष पहले लख़नऊ में 9 मार्च 1996 को उत्तर प्रदेश के तब के राज्यपाल मोतीलाल वोरा की उपस्थिति में ‘यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इण्डिया इम्प्लॉईज फेडरेशन‘ के सातवें राष्ट्रीय सम्मेलन उद्घाटन करते हुऐ उक्त बात रखी थी कि उनके एनएचआरए आज़ादी के मुक्ति संघर्ष के नए दौर में ‘बुलेट के बजाय बुलेटिन‘ का इस्तेमाल करने का निर्णय के बाद भगत सिंह को 1929 में दिल्ली की सेन्ट्रल असेम्बली की दर्शक दीर्घा से बम-पर्चे फ़ेंकने के बाद नारे लगाकर आत्म समर्पण करने के निर्देश दिया गया था । यह कदम इसलिए उठाया गया कि भगत सिंह के कोर्ट ट्रायल से स्वतन्त्रता संग्राम के उद्देश्यों की जानकारी पूरी दुनिया को मिल सके । ये क्रान्तिकारी, भारत को केवल आज़ाद ही नहीं कराना चाहते थे बल्कि शोषणमुक्त समाजवादी समाज भी कायम करना चाहते थे। भगतसिंह इस क्रान्तिकारी स्वतन्त्रता संग्राम के वैचारिक नेता थे ।कामरेड शिव वर्मा के अनुसार भगत सिंह ने कहा था कि फांसी पर चढ़ना आसान है किन्तु संगठन बनाना और चलाना बेहद मुश्किल है ।
“हमारे क्रान्तिकारी स्वतंत्रता संग्राम के समय हमें अपने विचार और उद्देश्य आम जनता तक पहुंचाने में मीडिया के समर्थन का अभाव प्रतीत हुआ था।शहीदे आजम भगत सिंह को इसी कारण आत्मसमर्पण करने का निर्णय लिया गया कि हमारे विचार एवं उद्देश्य आम लोगों तक पहुँच सकें।1983 में जब भगतसिंह के साथी शिव वर्मा देहरादून में एस एफ आई के उत्तर प्रदेश के राज्य सम्मेलन में बतौर मुख्य वक्ता थे उन्होंने क्रान्तिकारी आन्दोलन के उद्देश्यों पर विचार रखते हुये कहा कि भगतसिंह की शहादत के बाद क्रान्तिकारी आन्दोलन पर हमले तेज हुऐ ,उन दिनों doon घाटी हमारे लिऐ सुरक्षित शरणस्थली थी ,हम लोग महन्त इन्द्रैश चरणदास जी कै
दरबार साहिब में आये करते थे ,महन्त जी क्रान्तिकारी आन्दोलन को अच्छा मानते थे । शिव वर्मा ने कहा 15 अगस्त 1947 को हमें विदेशी शासकों से स्वतन्त्रता तो मिल गयी, किन्तु आज भी वैचारिक स्वतंत्रता नहीं मिल सकी है ,हमारे मीडिया पर चन्द पूंजीवादी घरानों का एकाधिकार है । जिसकी आज़ादी के लिए मुहिम छेड़कर वैचारिक स्वतंत्रता प्राप्त करनी होगी , क्योंकि आज के युग में मीडिया ही कारगर शस्त्र है ।
सोवियत रूस में बोल्शेविकों नें बुल्लेट का कम तथा बुलेटिन का प्रयोग अधिक किया था. हमारे भारतीय क्रांतिकारियों ने भी भगत सिंह के बाद अपनी आजादी की लड़ाई में बुलेट का प्रयोग कम करके बुलेटिन(वैचारिक कार्य) का प्रयोग बढ़ा दिया था।
28 सितंबर 1907 को लायलपुर में पैदा हुए भगतसिंह भारत के शहीदों का नाम लेते हैं तो उनमें सबसे पहले उन्ही का नाम याद आता है। भगत सिंह को आजादी की विरासत अपने परिवार से मिली थी क्योंकि उनके पिताजी और चाचा जी भी भारत को अंग्रेजी गुलामी और साम्राज्यवाद से मुक्त कराने के लिए जनता कै आन्दोलन में शामिल थे और कई बार जेल गए थे। भगत सिंह पूरी जिंदगी इसी नक्शे कदम पर चले और भारत को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराने के संघर्ष में शामिल हो गए। भगत सिंह के साथ उनके साथी राजगुरु और सुखदेव को भी 23 मार्च 1931 को फांसी पर लटका दिया था। भगत सिंह एवं उनके साथियों ने जेल में राजनीतिक सुधार और वहां फैले भेदभाव के खिलाफ 116 दिन की भूख हड़ताल की थी ,1926 में भारत नौजवान सभा की नींव रखी, 1929 में असेम्बली में बम फेंकने के बाद इन्कलाब जिन्दाबाद, रूस की क्रान्ति जिन्दाबाद, सोवियत सत्ता जिन्दाबाद और साम्राज्यवाद मुर्दाबाद, के नारे लगाए।
भारत के आजादी के संघर्ष और भारत के क्रान्तिकारी आन्दोलन के संघर्ष में भगत सिंह और उनके साथी ही सबसे पहले क्रान्तिकारी थे, जिन्होंने साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और उसका विकल्प “इन्कलाब जिंदाबाद” का नारा लगाकर पेश किया था और तभी से आज तक इन्कलाब जिन्दाबाद का नारा मजदूर वर्ग और किसान वर्ग का मुख्य नारा बना हुआ है। यही भगत सिंह की सबसे बड़ी देन है और साम्राज्यवादी नीतियां ही हमारे देश की जनता, किसानों, मजदूरों विद्यार्थियों और नौजवानों की सबसे बड़ी दुश्मन बनी हुई हैं। इनका खात्मा इन्कलाब जिन्दाबाद यानि समाजवादी क्रान्ति के द्वारा ही किया जा सकता है। हालांकि इन्कलाब जिन्दाबाद का नारा सबसे पहले 1921 में मौलाना हसरत मोहनी ने रचा था जिसका बाद में, भगत सिंह और उनके साथियों ने जमकर प्रयोग किया और आज भी भारत की जनता उसका सबसे ज्यादा प्रयोग कर रही है।
भगत सिंह ने क्रान्ति के सन्देश को जनता में ले जाने के लिए बलवंत, रंजीत और विद्रोही नाम से अखबारों में लेख लिखे। उन्होंने क्रान्ति के बारे में विस्तृत रूप से लिखा और मार्क्सवादी दर्शन के आधार पर समाजवादी समाज की स्थापना के लक्ष्य को सामने रखा। हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में समाजवादी शब्द जोड़कर इसे हिंदुस्तान समाजवादी रिपब्लिकन एसोसिएशन बनाने का काम भगत सिंह की पहल पर ही किया गया था।
उन्होंने सीधे सादे और साधारण लेखों के द्वारा क्रान्ति की अलख जगाने की बात की। उन्होंने मांग की कि समाज में आमूलचूल परिवर्तन और सरकार को अपने हाथों में लेकर किसानों मजदूरों की सरकार बनाने का आह्वान किया और भारत के क्रान्तिकारी आन्दोलन में यह भगत सिंह ही सबसे पहले क्रान्तिकारी थे जिन्होंने एक पार्टी बनाने की बात की थी और जिसका नाम “कम्युनिस्ट पार्टी” रखने की बात कही थी। भारत के क्रान्तिकारी इतिहास में भगत सिंह की यह भी एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। भगत सिंह के भारी लगाव तथा कम्युनिस्ट पार्टी को परिवर्तन का माध्यम मानते थे, उनके साथी शिव वर्मा का कहना था की भगत सिंह के पास हमेंशा कोई ना कोई किताब होती थी, वे किताब पढ़ते थै बल्कि उसे आत्मसात करते थे। वै क्रान्तिकारी लेखक थे। भारत के क्रान्तिकारी इतिहास में अब तक क्रान्तिकारियों द्वारा 139 लेख लिखे पाये गए हैं, जिनमें 97 लेख भगतसिंह ने लिखे हैं। क्रान्तिकारी भगतसिंह ने कहा था कि क्रान्ति का अलख जगाने के लिए नौजवानों को गांव-गांव, खेत, खलिहानों में और बस्तियों में जाना पड़ेगा और लोगों को क्रान्ति के लिए तैयार करना होगा। उन्होंने क्रान्ति को विस्तार देने के लिए पर्चे पम्पलेट और लेख लिखने की वकालत की। भाषा ऐसी हो कि वह साधारण आदमी की समझ में आ जाए।
उन्होंने गदरी बाबाओं की विरासत को आगे बढ़ाते हुए राजनीति को धर्म से अलग किया यह भगत सिंह और उसके साथियों का बहुत बड़ा योगदान है ,उन्होंने धर्म को व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला बताया और सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक आजादी की मांग की। तमाम तरह के शोषण, गुलामी और अन्याय को खत्म करने की वकालत की। भगत सिंह और उनके साथी व्यक्ति द्वारा व्यक्ति और देश द्वारा देश के शोषण और गुलामी के खिलाफ थे और उन्होंने इसका कठोर प्रतिवाद किया। भगत सिंह और उनके साथियों द्वारा देखे गए उनके सपने आज भी अधूरे हैं।
भगत सिंह और उनके साथियों का एक और बहुत बड़ा महान योगदान है और वह यह है कि उन्होंने भारत में धर्मनिरपेक्षता की नीव डाली, धर्म को राजनीति से अलग किया और सांप्रदायिक दंगों की मुखालफत की और कहा कि किसानों और मजदूरों की एकता कायम कर, वर्ग संघर्ष के आधार पर सांप्रदायिकता की राजनीति को खत्म किया जा सकता है। उन्होंने नौजवानों का आह्वान किया कि वह क्रान्ति के रास्ते पर चलें और क्रान्ति की अलख जगाएं और क्रान्ति की चिंगारी को गांव गांव, गली, मौहल्लों और कारखानों में ले जाएं और जनता को किसानों मजदूरों नौजवानों को क्रान्ति के लिए जागृत करें और संगठित करें। यह उनका सबसे जरूरी और मुख्य काम है, इसको किए बिना हमारे देश में क्रान्ति नहीं हो सकती और जनता को शोषण अन्याय जुल्म भेदभाव और देशी विदेशी गुलामी से छुटकारा नहीं मिल सकता।
जब भगत सिंह को फांसी लगाने का समय आया तो वे उस समय रूस के महान क्रान्तिकारी लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे, तो उस समय उनके जेलर से आखिरी शब्द थे कि,,,,, ठहरो एक क्रान्तिकारी दूसरे क्रान्तिकारी से बात कर रहा है” यह कहकर उन्होंने वह पर्चा मोड़ा और उस किताब को आकाश में उछाल दिया और फांसी के फंदे की तरफ चल पड़े। आज आगे बढ़ने की जरूरत है और शहीदे आजम भगत सिंह और उनके क्रान्तिकारी साथियों के सपनों को साकार करना है और भारत में एक क्रान्तिकारी सरकार की और राज सत्ता की स्थापना करने की जरूरत है।
भगत सिंह को फांसी लगने से पहले उनके वकील प्राणनाथ मेहता उन्हें क्रान्तिकारी लेनिन की एक किताब लेकर आए थे। जब प्राण नाथ मेहता भगत सिंह से मिलकर वापस आने लगे तो उन्होंने भगत सिंह से पूछा कि आपका देशवासियों के लिए अन्तिम पैगाम क्या है? तो इस पर भगतसिंह ने प्राणनाथ मेहता से कहा था कि “देशवासियों को ” _साम्राज्यवाद मुर्दाबाद” और “इन्कलाब जिंदाबाद_ ” के नारे की बात कहना, यही मेरा अपने देशवासियों के नाम अन्तिम पैगाम है।” आज सरकार शहीदों के सपनों को रौंद रही है। सच में यह शहीद ए आजम भगत सिंह और उनके साथियों के सपनों का भारत नहीं है।
आज हमारा और इस देश के समस्त किसानों ,नौजवानों और मजदूरों का यह सबसे प्रमुख क्रान्तिकारी कर्तव्य है कि वे भगत सिंह के नारों,,,, *साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और इंकलाब जिंदाबाद,* ,, के नारों को लेकर जनता के बीच जाएं और उन्हें क्रान्ति के लिए जागृत करें और संगठित करें और क्रान्ति के द्वारा किसानों और मजदूरों की सरकार और सत्ता कायम करें, तभी इस देश से हजारों साल पुराने शोषण, जुल्म, अन्याय, भेदभाव, अत्याचार, गरीबी, गुलामी और जुल्मों सितम का खात्मा और विनाश हो सकता है और इन सब से स्थाई तौर पर निजात मिल सकती है और मुक्ति मिल सकती है। इसके अलावा और कोई चारा या रास्ता नहीं है। पूंजीवादी समाज और उसकी सरकार, हमारे देश की जनता की समस्याओं को कभी भी हल नहीं कर सकता, क्योंकि उसके पास इनका इलाज है ही नहीं। जनता की समस्याओं का हल क्रान्ति करके, समाजवादी व्यवस्था कायम करके ही किया जा सकता है। हिंदुस्तान के महान क्रान्तिकारी सपूत शहीदे आजम भगत सिंह की सबसे बड़ी सीख है।
अन्त में कहना जरूरी है कि शहीदे-आज़म भगतसिंह, रूस में जारशाही के खिलाफ 1917 की महान बोल्शेविक क्रान्ति के जनक लेनिन के बड़े कायल थे. ट्रिब्यून (लाहौर) के 26 जनवरी 1930 के अंक में प्रकाशित दस्तावेज के अनुसार 24 जनवरी 1930 को लेनिन-दिवस के अवसर पर ‘लाहौर षड्यन्त्र केस’ के विचाराधीन क़ैदी के रूप में बन्द भगत सिह अदालती सुनवाई के लिये पहुंचे तो उनकी गर्दन पर लाल रूमाल बंधा था. वे क्रांतिकारी गीत गा रहे थे. उन्होने मैजिस्ट्रेट के आने पर समाजवादी क्रान्ति ज़िन्दाबाद , साम्राज्यवाद मुर्दाबाद के नारे लगाये।
_फिर भगतसिंह ने एक तार तीसरी इंटरनेशनल (मास्को) के अध्यक्ष के नाम प्रेषित करने के लिए मजिस्ट्रेट को दिया ।
तार था: लेनिन-दिवस के अवसर पर हम सोवियत रूस में हो रहे महान अनुभव और साथी लेनिन की सफलता को आगे बढ़ाने के लिए दिली मुबारक़बाद भेजते हैं. हम खुद को विश्व क्रान्तिकारी आन्दोलन से जोड़ना चाहते हैं, मज़दूर राज की जीत हो. सरमायैदारी का नाश हो. साम्राज्यवाद मुर्दाबाद !_
भगत सिंह को लाहौर षड्यन्त्र केस में फांसी की सज़ा हो जाने के बद जब 23 मार्च 1931 को लाहौर जेल की काल कोठरी में जेलर ने आवाज लगाई कि “भगत, फांसी का समय हो गया है, चलना पड़ेगा” तो जो हुआ वह इतिहास है._
काल कोठरी के अंदर से 23 वर्ष के भगत सिंह ने जोर से कहा: रुको! एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है. दरअसल, वह कामरेड लेनिन की किताब ‘कोलेप्स ऑफ़ सेकेंड इंटरनेशनल‘ पढ़ रहे थे._


