08 साल में 15 हजार से अधिक एनकाउंटर, हाईकोर्ट हैरान क्या है NHRC का नियम।
NHRC कर सकता है एनकाउंटर की जांच।

लखनऊ : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में बढ़ रहे एनकाउंटर और हाफ एनकाउंटर पर गहरी चिंता जताई है. जस्टिस अरुण कुमार देशवाल की सिंगल बेंच ने कहा कि पुलिस कानून से ऊपर नहीं है और अपराधी को सजा देना न्यायपालिका का काम है, न कि पुलिस का. कोर्ट ने कहा कि प्रमोशन, वाहवाही या सोशल मीडिया पर सुर्खियां बटोरने के लिए गोली चलाने की प्रवृत्ति न केवल गलत, बल्कि खतरनाक भी है. वहीं सूबे के मुखिया एनकाउंटर और हाफ एनकाउंटर को अपराधियों पर लगाम लगाने का प्रभावी तंत्र बता रहे है।
फर्जी एनकाउंटर मामले में गाजियाबाद की सीबीआई कोर्ट ने 9 पुलिस कर्मचारियों को दोषी करार दिया था. जिसमें से पांच कर्मचारियों को आजीवन कारावास व चार को पांच साल की सजा सुनाई थी. एटा में 2006 में हुए फर्जी एनकाउंटर मामले में सीबीआई कोर्ट ने 9 पुलिस वालों के सजा सुनाई थी।
यह फैसला कोर्ट ने 16 साल बाद सुनाया था. पुलिस पर आरोप था कि उसने 2006 में राजा राम नाम के एक बढ़ाई को फर्जी एनकाउंटर में मार दिया. उसकी पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील की. मामले को सीबीआई को सौंपा गया. लंबी सुनवाई के बाद आरोपी पुलिस कर्मचारियों को सजा मिली।
एनकाउंटर को सही व गलत साबित करना कानूनी पहलू : पूर्व डीजीपी एके जैन ने बताया, एनकाउंटर को सही और गलत ठहराना एक कानूनी मामला है. एनकाउंटर के बाद पुलिस को जांच व कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, ऐसे जो एनकाउंटर गलत होते हैं उसमें कार्रवाई भी होती है. एनकाउंटर के बाद घटना की FIR दर्ज कराई जाती है. एक अलग टीम विवेचना करती है. इसके बाद फाइनल रिपोर्ट या फिर चार्जशीट कोर्ट में पेश की जाती है।
कोर्ट तथ्यों के आधार पर एनकाउंटर को सही या गलत मानता है. कानूनी पहलू होने के नाते सीधे तौर पर एनकाउंटर पर राय बनाना ठीक नहीं है. समाजवादी पार्टी सरकार ने पुलिस विभाग में आउट ऑफ टर्न प्रमोशन पर रोक लगा दी थी, जो आज भी लागू है. यह बात सही है कि पुलिस विभाग में कुख्यात अपराधियों, डकैतों के खिलाफ कार्यवाही या एनकाउंटर करने वाले पुलिस कर्मचारी के सम्मान में स्टेट गवर्नमेंट केंद्र सरकार के पास गैलेंट्री मेडल के लिए भेजती है।
मानवाधिकार आयोग के सदस्य जस्टिस राजीव लोचन मेहरोत्रा ने बताया, एनकाउंटर के फर्जी होने की संभावना पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) खुद संज्ञान लेकर मामले की जांच कर सकता है. एनकाउंटर फर्जी साबित होने पर पीड़ित को मुआवजा दिया जाता है. एनकाउंटर करने वाले पुलिस कर्मचारियों पर कार्यवाही की सिफारिश भी करता है.राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग इस बात का ध्यान रखना है कि पुलिस की कार्यवाही में संविधान के अनुच्छेद 21 जीवन के अधिकार का उल्लंघन न किया जाए. इसके लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को तमाम अधिकार मिले है।
हाईकोर्ट के वकील वीर बहादुर सिंह ने कहा, भले ही एनकाउंटर को सही या गलत कहना कानूनी मामला है, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि पुलिस विभाग में एनकाउंटर करने वाले पुलिस कर्मचारियों का एक अलग ही रुतबा होता है.पुलिस अधिकारियों की काबिलियत को एनकाउंटर की संख्या के आधार पर मापा जाता है. यूपी पुलिस में तमाम ऐसे अधिकारी कर्मचारी हैं, जो एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के नाम से जाने जाते हैं और एनकाउंटर के बदले गैलंट्री मेडल भी मिले है।
हाईकोर्ट के वकील वीर बहादुर सिंह ने बताया, अगर किसी के साथ फेक एनकांउटर होता है, तो वह पुलिस के खिलाफ कार्यवाही के लिए कोर्ट की मदद ले सकता है. लखनऊ में अजीत सिंह हत्याकांड के आरोपी गिरधारी के एनकाउंटर के मामले में लखनऊ के अधिवक्ता प्रांशु अग्रवाल ने जिला कोर्ट से पुलिस पर एफआईआर दर्ज करने का आदेश कराया था. हालांकि, जिला कोर्ट के आदेश के खिलाफ पुलिस कर्मचारियों को हाईकोर्ट से राहत मिल गई थी. हाईकोर्ट ने सिविल कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया था
उत्तर प्रदेश पुलिस में एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के नाम से मशहूर डिप्टी एसपी डीके शाही को गणतंत्र दिवस के मौके पर गैलेंट्री मेडल से नवाजा गया है. डीके शाही को पंकज यादव को एनकाउंटर में मार गिराने के लिए यह वीरता पुरस्कार दिया गया है. डीके शाही को अब तक पांच गैलेंट्री मेडल, मुख्यमंत्री वीरता पुरस्कार, डीजीपी गोल्ड सिल्वर व ब्राउन मेडल मिल चुका है।
डीके शाही ने अब तक 70 से अधिक कुख्यात अपराधियों का एनकाउंटर किया है. पुलिस विभाग में रहते हुए अपराधियों के खिलाफ प्रभावी कार्यवाही करने के लिए वर्ष 2010 में डीके शाही को आउट ऑफ टर्न प्रमोशन देते हुए सब इंस्पेक्टर से इंस्पेक्टर बनाया गया था. 2018 में डीके शाही डिप्टी एसपी के पद पर प्रमोट हुए. डीके शाही वर्तमान में यूपी एसटीएफ में तैनात है।
हाईकोर्ट के कमेंट के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पुलिस के सामने आने वाली चुनौतियों का जिक्र किया. कहा, जब अपराधी सामने से गोली चल रहे होते हैं, तो हमारे पुलिस कर्मचारी गोली चलाने के लिए मजबूर होते हैं. ऐसा नहीं है कि सामने से गोली आ रही है और हम हाथ पैर हाथ धरे बैठे रहेंगे।
पुलिस को असलहा चलाने की ट्रेनिंग इसीलिए दी जाती है कि अपराधियों के खिलाफ प्रभावी कार्यवाही की जाए. वहीं एडीजी लॉ एंड ऑर्डर, चीफ एसटीएफ अमिताभ यश ने कहा कि फेक एनकाउंटर का विषय कोर्ट से सबंधित है. इसपर कुछ कहना मेरा विषय नहीं है।


