उत्तराखंड

पण्डित जवाहरलाल नेहरू की जयंती पर बिशेष : अनन्त आकाश।

देहरादून : हिन्दुस्तान की 2014 के चुनाव में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की राजनीति सत्ता में आने के बाद निरन्तर यह प्रचारित किया जाता रहा है कि इससे पहले देश में जो होना था ,वह नहीं हुआ और अब होगा ।संघ परिवार ने देश की तमाम दिक्कतों के लिऐ नेहरू को जिम्मेदार ठहराना शुरू किया ,नेहरू के समकक्ष पटेलजी को खड़ा करना शुरू किया जबकि हकीकत यह है कि नेहरू व पटेल समकालीन राजनीति के एक दूसरे के पूरक थे ।‌महात्मा गांधी की हत्या के बाद पटेल ही थे जिन्होंने संघ को प्रतिबन्धित किया था ।ताजुब की बात यह है कि जो महात्मा गांधी ,पटेल ,विवेकानंद ,शहीदे आजम भगत सिंह साप्रदायिक राजनीति के विरोधी थे ,उन्ही का संघ परिवार अपनी विभाजनकारी राजनीति के लिऐ चालाकी से उपयोग करती रही ।पिछले मोदी सरकार के 9 साल का यही अनुभव है ।

आज देश में बिध्देष की राजनीति हावी है,अल्पसंख्यक ,दलित तथा महिलाओं के खिलाफ दुष्प्रचार में तेजी आयी है तथा असहिष्णुता बढ़ी है, जिसे सत्ता का संरक्षण मिलता रहा है,मणिपुर में निरन्तर घटित हो रही घटना इसी नीति का हिस्सा है ।

अब मोदी सरकार अपनी विफलताओं के लिऐ विपक्ष को ही कोषती आयी है ,सत्ता का कोप भाजन नेहरू जी को ही होना पड़ा है ।

आज़ादी के एक इस महानायक जिसके बारे में असंख्य अप्रमाणित सकारात्मक और नकारात्मक दंतकथाएं भारतीय लोक जीवन में प्रचलित हैं।

नेहरू ऐसे सहिष्णु राजनेता रहे और आज भारतीय जनमानस को उनके बारे में तरह – तरह से दिग्भम्रित किया जा रहा है।

नेहरू का व्यक्तिगत जीवन बेहद गरिमापूर्ण रहा है। नेहरू का जन्म 14 नवम्बर 1889 को इलाहाबाद में हुआ, पिताजी मोतीलाल नेहरू एक समृद्धि बैरिस्टर और माता स्वरूपरानी कुशल गृहणी थी। पारिवारिक रूप से संपन्न नेहरू ने अपनी स्कूली शिक्षा हैरो से और कॉलेज की शिक्षा ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज (लंदन) से पूरी की थी। तत्पश्चात उन्होंने अपनी लॉ की डिग्री कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पूरी की। वे 1912 में भारत लौट आये और वकालत की शुरूआत की। 1916 में कमला नेहरू से उनका विवाह हुआ। स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौर में उनके महत्तवपूर्ण योगदान को देखते हुऐ गांधीजी ने नेहरू को ही अपना उत्तराधिकारी चुना

“गांधी के अनुयायियों में जवाहरलाल नेहरू ही थे जिन्होंने उनकी सम्मिलित देशभक्ति को थामे रखा। महात्मा की तरह वे भी एक व्यक्ति के रूप में और अपनी विचारधारा में नस्ल और धर्म, जाति और वर्ग, लिंग और भौगोलिक परिवेश से ऊपर उठकर थे। वह एक ऐसे हिंदू परिवार से थे जो मुसलमानों के साथ दोस्ताना व्यवहार रखते थे, एक ऐसे कुलीन ब्राह्मण थे जो जातियों के बंधन को नहीं मानते थे, एक ऐसे उत्तर भारतीय थे जो दक्षिण पर हिंदी नहीं थोपते थे, एक ऐसे शख्स थे जिसकी वैज्ञानिक सोच पर लोग भरोसा करते थे …इस तरह गांधी के बाद नेहरू ही सबसे विशाल हृदय भारतीय थे।

नेहरू के चिंतन को जानने का महत्वपूर्ण स्रोत ऐ उदाहरण मात्र हैं ,पिता के पत्र : पुत्री के नाम (1929),ग्लिंप्सेज ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री (1933),ऐन ऑटो बायोग्राफी (1936),डिस्कवरी ऑफ इंडिया (1946)

नेहरू का चिंतन मूल रूप से मानवतावादी है , उनका दृष्टिकोण पश्चिमी एवं आधुनिक था, साथ ही वे भारतीय परिस्थितियों की जटिलताओं को भी समझते हैं। नेहरू के दृष्टिकोण में लोकतंत्र, समाजवाद तथा धर्मनिरपेक्षता आपस में घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए थे।नेहरू अज्ञेयवादी थे जिन्होंने धर्म को मात्र एक सांस्कृतिक प्रेरणा तथा विरासत के रूप में ही स्वीकार किया। स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले ही नेहरू पर समाजवादी विचारधारा का प्रभाव पड़ चुका था। 1917 की रूसी क्रांति ने नेहरू को गहरे तौर पर प्रभावित किया था। वे कहते थे‌ कि,

“समाजवाद मात्र एक आर्थिक सिद्धांत ही नहीं बल्कि एक जीवनदर्शन भी है और यह अपने इसी स्वरूप में मुझे प्रेरित करता है।

नेहरू की व्यवहारिकता और आदर्शवादिता दोनों गुणों का समन्वय था। जो कि एक दुर्लभ गुण है। नेहरू के विचारों में पश्चिमी सभ्यता व आधुनिकता का समावेश था। स्वाभाविक रूप से लोकतंत्र के समर्थक पंडित नेहरू संसद व कांग्रेस को साथ लेकर चलते रहे। अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए संवैधानिक नियमों के अनुरूप दक्षतापूर्वक कार्य करने में उन्होंने कभी संकोच नहीं किया। राष्ट्रवाद के प्रति उनकी मानसिकता संकीर्ण नहीं थी। वे राष्ट्रीयता के गुणों को भली-भांति समझते थे। इसीलिए उन्होंने देश को एक संतुलित, संयमशील एवं आदर्श राष्ट्रवाद के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया।नेहरू का राजनीतिज्ञ के रूप में सबसे महत्वपूर्ण कार्य भारतीय राजनीतिक प्रणाली में लोकतांत्रिक मूल्यों का विकास करना और भारत में लोकतंत्र को खड़ा करना था। नेहरू संसदीय लोकतंत्र के सिद्धांत और व्यवहार के प्रबल समर्थक थे। उनकी दृष्टि में राजनीतिक लोकतंत्र अपने आप में साध्य नहीं बल्कि वह भारत के लाखों करोड़ों लोगों के दुख-दर्द और गरीबी दूर करने का साधन मात्र था। उन्होंने लोकतंत्र के साथ स्वतंत्रता और समानता के अटूट संबंध को स्वीकार किया। उनका मानना था कि समानता के बगैर स्वतंत्रता और लोकतंत्र का कोई अर्थ नहीं है।

सन् 1952 में पंडित नेहरू के नेतृत्व में देश के पहले आम चुनाव में स्वस्थ लोकतंत्र की जो नींव रखी गई थी वह आज तक जारी है। नेहरू के लिए लोकतंत्र का तात्पर्य एक ऐसा उत्तरदायित्वपूर्ण तथा जवाबदेह राजनीतिक प्रणाली थी, जिसमें विचार-विमर्श और प्रक्रिया के माध्यम से शासन हो।

देश के प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू का योगदान अविस्मरणीय है ,जिनमें धर्म निरपेक्षता ,संवैधानिक परम्पराओं का पालन ,सार्वजनिक प्रतिष्ठानों का निर्माण ,औधोगिक विकास ,शिक्षा ,स्वास्थ्य तथा बुनियादी ‌ढा़चे का निर्माण तथा विशाल भारत को एकजुटता के साथ आगे बढा़ना प्रमुख है ।नेहरू की 134विं जयंती पर शत् शत् नमन ।

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