
देहरादून : वैसे तो समाज में हरेक महिला की भूमिका शिक्षक की है ,वह बचपन से लेकर जीवन के हरेक मोड़ पर समाज को दिशा देती है वे दुख ,कष्ट ,अभाव सहते हुऐ विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भी अपना कर्तव्य निभाती हैं उन्ही में से अग्रणी हैं सावित्रीबाई ,3 जनवरी 1831 में पुणे में दलित परिवार में जन्मी सावित्री बाई फुले ,जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन महिलाओं,शोषित-पीड़ित और वंचितों के लिए समर्पित कर दिया है, उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें शत् शत् नमन।
उनके जीवन के कुछ यथार्थ :-
(1)सावित्री बाई फूले की सन् 1840 में 9 साल की उम्र में शादी हो गई थी उन्होंने अपने पति ज्योति फुले के साथ मिलकर लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोलें । पहला बालिका विद्यालय सन 1848 में महाराष्ट्र के पुणे में खोला ।
(2)सावित्री बाई ने जनवरी 1853 में गर्भवती पीड़ित महिलाओं के लिए बाल हत्या प्रति-बंधक गृह की स्थापना की और सावित्रिबाई को आंदोलन की पहली नेता भी कहा जाता है।
(3)उस दौर में लड़कियों का जब घर से बाहर निकलना उनको पढ़ना- लिखना भी सही नहीं माना जाता था , उस दौरान सावित्रीबाई ने बालिकाओं के लिए स्कूल खोले।
(4)उनको विद्यालय खोलने पर बहुत ही कठिनाइयों का सामना करना पड़ा ,लोग उन पर पत्थर फेंकते और गन्दगी भी फेंकते थे फिर भी अपने इरादों से पीछे नहीं हटी और अपने लक्ष्य के प्रति अडिग रही ।
(5) सावित्री बाई फूले एक कवियत्री भी थी उनको मराठी कवित्री के रूप में जाना जाता है, इनको आधुनिक मराठी काव्य का भी अग्रदूत माना जाता हैं।
(5) सावित्री बाई ने 19वीं सदी में अपने पति ज्योतिबा फूले के साथ मिलकर छुआछूत, सती प्रथा,बाल विवाह और विधवा विवाह जैसी कुरीतियों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी दोनों ने साथ मिलकर इनके खिलाफ आवाज उठाई और दोनों ने एक साथ काम किया।
(6)सावित्रीबाई फूले ने औरतों को ही नहीं बल्कि मर्दों को भी शिक्षित करने का कार्य किया ।
(7)दुनिया में लगातार विकसित और नारीवादी सोच की ठोस बुनियाद सावित्री बाई और उनके पति ज्योतिबा ने मिलकर डाली थी ।
(8) दोनों ऑक्सफोर्ड नहीं गऐ थे ,बल्कि उन्होंने यही रहकर हमारे यहाँ की कुप्रथा को पहचाना और उनका विरोध किया और उनका समाधान भी यहीं रहकर करने की कोशिश की ।
जातिवादी एवं साम्प्रदायिकता के कुचक्र में हमारा समाज ग्रसित है जिसका खामियाजा हम सबको बिशेषकर कमजोर वर्ग के हिस्से को झेलना पड़ रहा है , 190 वर्ष बाद भी ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले के संघर्ष एवं बलिदान की समसामयिकता बनी हुई है ।
(9)महिलाओं की शिक्षा के लिए उनका योगदान अद्वितीय है, जहां महिलाओं को निशाना बनाया जाता था वहां उनके खिलाफ बोलने वालों के लिए भी इन्होंने अपनी आवाज उठाई।उन्होंने आंदोलन में एक नई दिशा दी और विधवाओं के हकों की आवाज भी साथ -साथ उठाई।
(10)सावित्रीबाई को दलित समाज तथा महिलाओं को शिक्षित करने वाली देश प्रथम महिला शिक्षक के रूप में जाना जाता है उनकी इस योगदान को आगे बढा़ने में समाजसेवी बीबी फातिमा का महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित करना जरूरी हो जाता है ।
उनकी 10 मार्च 025 पुण्यतिथि पर शत् शत् नमन !


